रविवार, 6 सितंबर 2020

विज्ञान कथा लेखन में महिलाओं का योगदान

 


विज्ञान कथा लेखन में महिलाओं का योगदान
 आज का युग विज्ञान का युग है| वर्तमान में प्रत्येक क्षेत्र विज्ञान से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हैं| प्राचीन समय से ही मानवीय प्रवृत्ति जिज्ञासु एवं नवनिर्माण की रही है| विभिन्न आविष्कारों से मानव जीवन का भौतिक विकास हुआ| समय के साथ-साथ मनुष्य की वैज्ञानिक दृष्टि भी विकसित होती रही है| जो कल्पनाएँ एक समय में असंभव प्रतीत होती थी वह यथार्थ में साकार हो रही है| एक बात निर्विवाद रूप से स्पष्ट है कि वैज्ञानिक विकास के केंद्र में मनुष्य जीवन ही है| कोई भी वैज्ञानिक आविष्कार मानव जीवन को सुखकर बनाने के लिए ही किया जाता है| वैज्ञानिक सिद्धांत जितने जटिल होते है उतने ही सामान्य पाठक के लिए नीरस प्रतीत होने की सम्भावना रहती है| इसलिए इस वैज्ञानिक दृष्टी को एवं तथ्यों को रोचकता एवं कलात्मकता के साथ अभिव्यक्त किया जाता है तो सामान्य पाठकों के मन में गहन एवं गंभीर विषयों के प्रति रूचि निर्माण होती है| इसी को केंद्र में रखकर विज्ञान कथा सृजन का प्रारम्भ हुआ होगा| विज्ञान कथा लेखन बड़े पैमाने में नहीं हुआ क्योंकि विज्ञान कथा लिखने के लिए लेखक के पास वैज्ञानिक सिद्धांतों की जानकारी  होनी आवश्यक है या लेखक की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि होनी चाहिए| इस बात को स्पष्ट करते हुए मनोहर श्याम जोशी ने लिखा है -“हिंदी में अब तक विज्ञान कथा लेखन का क्षेत्र लगभग अछुता ही रहा है| शायद इसलिए कि यह काम आसान नहीं| उत्कृष्ट विज्ञान कथाओं के सृजन के लिए यह जरूरी है कि विज्ञान के आधुनिकतम आविष्कारों,उनकी संभावनाओं और दायित्व बोध से भलीभांति परिचित होने के साथ ही लेखक रोचक और बोधगम्य शैली का भी धनी हो|”1 विज्ञान कथाकार का प्रतिपाद्य विज्ञान को सामान्य लोगों तक पहुँचाना है| लेखक को मर्यादाओं में रहकर ही काल्पनिक संसार खड़ा करना होता है| लेखक को उन्हीं बातों का जिक्र करना पड़ेगा जिसमें भविष्य में सम्भव होने के चिह्न प्रतीत हो|
 बाल फोंडके ने ‘बीता हुआ भविष्य’ नाम से विज्ञान कथाओं का संकलन किया जिसकी भूमिका में उन्होंने लिखा है – “भारत में किसी भी भाषा में लिखी जा रही विज्ञान कथाओं की मूल विषय-वस्तु प्रमुखतया मानव केन्द्रित है जो वैज्ञानिक प्रगति तथा मानवीय संवेदनाओ अथवा सामाजिक सिद्धान्तों के पारस्परिक प्रभाव को  दर्शाती है|”2 हिंदी में कहानी विधा में बहुत लेखन हुआ है| विज्ञान कहानी और साहित्यिक-सामाजिक कहानी में अंतर बताते हुए विज्ञान कथा लेखक डॉ.अरविन्द मिश्र के कहते है -“विज्ञान कथा साहित्यिक कहानियों की तरह ही कहानी की एक विधा है जिसमें आनेवाले कल की तसवीरें देखने को मिलती हैं जबकि सामाजिक कहानियों में अतीत या वर्तमान की झलक देखने को मिलती है|”3 मोटे तौर पर कहा  जा सकता है कि जो कथा विज्ञान को केंद्र में रखकर लिखी जाती है वही विज्ञान कथा है|
 हिंदी में समृद्ध ना सही लेकिन विज्ञान कथा लेखन की परम्परा दृष्टिगोचर होती है| आधुनिक कथा साहित्य के अंतर्गत प्रारम्भ में जब तिलस्मी-जासूसी कथा साहित्य का सृजन हो रहा था उस समय से ही विज्ञान कथा लेखन प्राप्त होता है| अम्बिका दत्त व्यास द्वारा रचित ‘आश्चर्य वृत्तान्त’ विज्ञान कथा है जिसका प्रकाशन धारावाहिक रूप से ‘पीयूष प्रवाह’ पत्रिका में सन 1884-1888 में हुआ| उसके बाद सन 1900 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में बाबू केशव प्रसाद सिंह की विज्ञान कथा ‘चन्द्रलोक की यात्रा’ प्रकाशित हुई| सन 1908 में सत्यदेव परिव्राजक ने सरस्वती पत्रिका में ‘आश्चर्यजनक घंटी’ नामक विज्ञान कथा लिखी जो ध्वनि के अनुनाद के सिद्धांत पर आधारित है| सन 1915 में ‘विज्ञान’ नामक पत्रिका का प्रारंभ हुआ| प्रेम वल्लभ जोशी ने ‘छाया पुरुष’ (1915) प्रकाश के अपवर्तन पर कहानी लिखी| अनादिधन बंद्योपाध्याय ने 1915-16 में मंगल यात्रा का वृत्तान्त लिखा| देवकीनंदन खत्री के पुत्र दुर्गाप्रसाद खत्री ने ‘स्वर्गपुरी’ नामक रचना लिखी जिसमें उन्होंने स्टीलमैन(रोबोट) की परिकल्पना की जो आज सम्भव हो रही है| डॉ.सम्पूर्णानन्द ने ‘पृथ्वी से सप्तर्षि मंडल’(1953) लम्बी विज्ञान कथा लिखी जिसे लघु उपन्यास भी कहा जा सकता है| डॉ.नवलबिहारी मिश्र ने अधूरा अविष्कार (1960),सत्य और मिथ्या (1963) दो विज्ञान कथाओं के संग्रह के माध्यम से विज्ञान कथा लेखन को नई दिशा प्रदान की| डॉ.ओमप्रकाश शर्मा ने भारतीय पुराण कथाओं में विज्ञान की तलाश की| पुराणों में विज्ञान कथाओं के बीज खोजने का प्रयास किया| मंगल यात्रा,जीवन और मानव उनकी महत्वपूर्ण रचनाएँ है| उनकी ‘शिशु उत्पादन कारखाना’ नामक कहानी चर्चित है| राम लखन सिंह ने वैज्ञानिक की सनक (1966),मौत एक पेड़ पर(1970) कहानियों का सृजन किया| रमेश वर्मा की चन्द्रलोक की यात्रा,झिलमिलाते सितारे,हमारा पड़ोसी चाँद,अन्तरिक्ष की खोज आदि कहानियाँ महत्वपूर्ण हैं| कैलास साह का मृत्युंजय(1976)विज्ञान कथाओं का संग्रह तथा मायाप्रसाद त्रिपाठी के आकाश की जोड़ी(1971),साढ़े सात फुट की तीन औरते(1971) कथा संग्रह भी विज्ञान साहित्य में काफी प्रशंसनीय है|
 1960-70 के दशक में विज्ञान कथा लेखन के लिए पर्याप्त वातावरण बना था| काफी लोग विज्ञान कथा लेखन में सक्रिय हुए| देवेन्द्र मेवाड़ी का नाम महत्वपूर्ण है जिन्होंने ‘किसान भारती’ नामक कृषि मासिक पत्रिका का सम्पादन कार्य किया| पशुओं की प्यारी दुनिया,हार्मोन और हम,फसले कहे कहानी आदि उनकी रचनाएँ है| मेवाड़ीजी के भविष्य(1994) और कोख(1998) कहानी संग्रह महत्वपूर्ण है| अरविन्द मिश्र ने गुरु दक्षिणा(1985)रचना लिखी| उनका ‘एक और क्रोंचवध’(1998) कहानी संग्रह है जिसमें बारह कहानियाँ संग्रहित है| डॉ.राजीव रंजन उपाध्याय का विज्ञान कथाओं का संग्रह ‘आधुनिक विज्ञान कथाएँ’ (1994) महत्वपूर्ण है जिसमें सोलह कहानियाँ संकलित है|
इनके अतिरिक्त विज्ञान कथा लेखन में शुकदेव प्रसाद,जाकिर अली रजनीश,हरीश गोयल,जीशान हैदर जैदी.मनीष गोरे,अमितकुमार आदि लेखकों का महत्वपूर्ण योगदान हैं|
 विज्ञान कथा साहित्य लेखन परम्परा में महिला लेखिकाओं ने विज्ञान कथाओं का सृजन करके अपनी वैज्ञानिक दृष्टि का परिचय दिया है जिसमें मृदुला गर्ग,कल्पना कुलश्रेष्ठ,निर्मला भुराड़िया,विनीता,सिंघल,अर्चना शर्मा,डॉ.शशि सिंह आदि महत्वपूर्ण है| मृदुला गर्ग की कहानी ‘कालिदास का विद्रोही मेघ’ सारिका पत्रिका में अप्रैल 1985 में छपी थी जो भोपाल गैस त्रासदी पर आधारित है| कहानी पर्यावरणीय विभीषिकाओं से हमें सचेत करती है| मध्यप्रदेश के भोपाल शहर में 3 दिसम्बर 1984 को भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई| भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी के कारखाने से एक जहरीली गैस का रिसाव हुआ जिससे लगभग पन्द्रह हजार से अधिक लोगों की जन गई तथा बहुतांश लोग अनेक तरह की शारीरिक अपंगता से लेकर अंधेपन के भी शिकार हुए| वह रासायनिक कीटकनाशक उत्पादन का कारखाना था| भोपाल गैस त्रासदी मानव इतिहास की एक ऐसी औद्योगिक त्रासदी है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता| इस दुर्घटना को पृष्टभूमि बनाकर मृदुला गर्ग ने वैज्ञानिक औद्योगिक विकास और उसके परिणामस्वरूप निर्माण हो रही पर्यावरणीय समस्याओं को उठाया हैं| कालिदास ने अपनी प्रेयसी को संदेश भेजने के लिए मेघ को अपना दूत बनाया था| लेखिका कहती है कालिदास आज जीवित होते तो उनका मेघ जहर के बादल के बीच बिला गया होता| लेखिका कल्पना करती है कि “यह भी हो सकता था कि मेघ खुद कह उठता उनसे बहुत हुआ,अब और सहायता मैं मनुष्य की नहीं कर सकता|क्यों युद्ध छेड़ रखा है उसने प्रकृति से? प्रकृति ने बहुत सहा बहुत चेताया,पर मानव नहीं चेता|बहुत हुआ कवि अब प्रकृति को अपने बचाव के लिए हिंसा करनी होगी|मेरा दर्द तुम यदि समझ नहीं सकते,मेरी मजबूरी से द्रवित नहीं हो पाते तो कैसे कवि हो? जानते हो,अब मेरा बहाव निर्मल नहीं,अबाध नहीं|पथ अवरुद्ध है,मैला है,रुका कटा ,बोझ तले घुटा है|अपनी दिशा तलाशने के लिए मुझे लड़ना पड़ता है|पल-पल दूषित होना पड़ता है|रोज-रोज जहरीले कण पीने के बजाय एक बार ही समूचा जहर निगल जाऊंगा और बरसा दूंगा मनुष्य जाति पर|”4 देश स्वतंत्रता के बाद औद्योगिक विकास को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया जिसपर टिप्पणी करते हुए लेखिका कहती है “विकास को रोक तो नहीं सकते औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण हमारी नीतियाँ है और उनकी राह पर चलना अपनी कीमत मांगता है|यानी अभी और बहुत लोग मरेंगे और अधिक पंगु होंगे| जहर उगलते कारखानों में रोजगार पाये मजदूरों के बच्चे भरपेट मरेंगे|”5 लेखिका स्पष्ट करती है कि देश में राजतन्त्र और उद्योगतन्त्र का गठबंधन है जिसको सामान्य मनुष्य तोड़ नहीं सकता| जो सत्ता में है उनके घर कारखानों से दूर होते है| कहानी के उत्तरार्ध में मेघ का कहना है कि  वह अब कभी नहीं बरसेगा और हवा भी प्रदुषण के कारण उपर ही कैद रहेगी| मेघ कहता है “सूरज अब कभी नहीं निकलेगा जब-जब कारखाने जहर उगलेंगे,सर्द हवा उसे नीचे खींचे रहेगी|धूप होगी नहीं तो जहर का धुआं भाप बनकर ऊपर कैसे उठेगा,यही बिछा रहेगा तुम्हारे सिरों के ऊपर और धंसता जायेगा लगातार तुम्हारे फेफड़ों के अंदर|6 लेखिका संकेत करती है कि हमें वैज्ञानिक औद्योगिक विकास के साथ प्राकृतिक संसाधनों के बारे में भी गम्भीरता से सोचना होगा|
 कल्पना कुलश्रेष्ठ की कहानी ‘अपराधी’ विज्ञान प्रगति पत्रिका में अगस्त,1997 में छपी थी जिसमें उन्होंने भविष्य में मानव के अमरत्व का काल्पनिक संसार गढ़ा है| मानव जीवन प्रकृति प्रदत्त है| वैज्ञानिक प्रयोगों की मर्यादाएँ प्रकृति के सामने हमेशा स्पष्ट हुई है और भविष्य में भी स्पष्ट होती रहेगी| कहानी का समय सन 2120 है|शैलेश और शुभदा दोनों पति-पत्नी है| वे एक दूसरे से बेहद प्रेम करते है साथ ही एक दूसरे के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित है| विवाह के छे वर्ष के बाद भी शैलेश के मन में शुभदा के प्रति आकर्षण है| एक दिन दोनों भी हादसे में घायल हो जाते है| दोनों को अस्पताल में पहुँचाया जाता है| अस्पताल में शैलेश को मिलने के लिए उसके बड़े भाई श्रीधर आते है जो अमेरिका में शोधकार्य कर रहे है| शैलेश तो ठीक हो जाता है| वो श्रीधर से शुभदा के बारे में जानना चाहता है| शैलेश का शुभदा के प्रति प्रेम श्रीधर जानता है इसलिए आगे का इलाज करने के लिए वह शुभदा को अपने साथ अमेरिका लेकर जाता है| तीन माह बाद अपना वादा पूरा करके श्रीधर शुभदा को शैलेश के पास भेज देता है| दोनों ने मृत्यु को इतना नजदीक से देखा था लेकिन बाद में वैवाहिक जीवन शुरू हो जाता है| अचानक श्रीधर को पता चलता है कि शैलेश ने अपनी पत्नी शुभदा की हत्या की और जेल चला गया है| श्रीधर भारत आता है और तुरन्त जेल में शैलेश को मिलने जाता है| शैलेश श्रीधर को हत्या की वजह बताता है| दरअसल उस दुर्घटना के बाद शुभदा में अजीब सा परिवर्तन आ गया था| वह एक मूर्ति की तरह भावशून्य हो गई थी यंत्र की तरह संवेदनाहीन हो चुकी थी|शैलेश हमेशा भय में घिरा रहता था और एक दिन निराशा में उसको मार डालता है| जब शैलेश को न्यायालय के कटघरे में खड़ा किया जाया है तो श्रीधर शुभदा के बारे में सभी रहस्यों को खोलता है जो चौकानेवाले है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते| श्रीधर स्पष्ट करता है कि शुभदा की मृत्यु  हादसे में ही हुई थी| वह न्यायालय के सामने स्पष्ट करता है उन्होंने कृत्रिम मस्तिष्क को शुभदा के मस्तिष्क के स्थान पर प्रत्यारोपित किया| न्यायालय में सन्नाटा छा जाता है| मानव जाति के इतिहास में यह अनोखी घटना थी| कहानी से स्पष्ट होता है कि प्रत्यारोपित कृत्रिम मस्तिष्क कभी भी प्राकृतिक मस्तिष्क का स्थान नहीं ले सकता| इसलिए उसके नकारात्मक पक्ष ही सामने आये| कहानी का अंतिम वाक्यांश कहानी के कथ्य को और भी स्पष्ट करते है “विज्ञान,प्रकृति और मानव तीनों कितने भी अन्तरंग हो इनके बीच सूक्ष्म सीमा रेखाएँ अवश्य है जो इन्हें अपनी-अपनी परिधि में रहने को विवश करती है| जहाँ यह सीमा रेखाएँ टूटी वहीं कोई जटिल गुत्थी सुरसा सां मुख फैलाये उठ खड़ी होती है सब कुछ निगलने को आतुर|”7
 निर्मला भुराड़िया की कहानी ‘जिन्दगी श्रीधर सेवक की’ जनसत्ता 6 फ़रवरी 1994 में छपी थी| कहानी के केंद्र में यंत्रमानव अर्थात रोबोट है जिसकी चर्चा वैज्ञानिक विकास के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर हुई है| अभी कुछ दिन पहले ‘सोफिया’ रोबोट की चर्चा माध्यमों में बहुत हुई जिसको सऊदी अरब ने नागरिकता दी है| सोफिया की विशेषता है कि वह भाव भंगिमाएँ पहचान सकती है| कृत्रिम बुद्धिमत्ता को बढ़ावा देने के लिए सऊदी अरब ने रोबोट को नागरिकता दी| निर्मलाजी ने अपनी कहानी में रोबोट के सकारात्मक पक्ष सामने रखा है| कहानी में डॉ. सिन्हा अपने घरेलू एवं ऑफिस के कार्य करने के लिए श्रीधर नामक रोबोट को अपने घर रखते है|श्रीधर सब काम करता है| डॉ.सिन्हा श्रीधर रोबोट में आत्मनिर्णय की क्षमता और आत्मनिर्भरता निर्माण करना चाहते है| वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता को स्थापित करना चाहते है| वे उसके अंदर मानवीय भावनाएं निर्माण करना चाहते है और वे अपने इस कार्य में सफल भी होते है| डॉ.सिन्हा के पड़ोसी की युवा पुत्री मंजूषा कार दुर्घटना में अपने दोनों पैर खो चुकी है और वह स्वचालित कुर्सी का ही इस्तमाल करती रहती है| उसके देखभाल का स्थायी रूप से इतंजाम हो इसलिए डॉ. सिन्हा उसके माँ-पिताजी से श्रीधर रोबोट द्वारा मंजूषा की देखभाल करने का विचार रखते है| वे भी इसको स्वीकार करते है| बाद में श्रीधर मंजूषा की देखभाल करता है| उसका मंजूषा के प्रति लगाव भी डॉ. सिन्हा को नजर आता है जब श्रीधर मंजूषा को फूल भेंट देता है| एक दिन जब मंजूषा के घर में आग लग जाती है तो श्रीधर मंजूषा की जान बचाता है और वही जलता टुकड़ा उसपर गिर जाता है और बड़ा विस्फोट होकर वह खत्म हो जाता है| कहानी एक रोबोट के अंदर भावनाएँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्थापित होने की सम्पूर्ण सम्भावनाओं को व्यक्त करती है|
 विनीता सिंघल की कहानी ‘अपराधी कौन’ विज्ञान प्रगति पत्रिका में अगस्त 1994 में छपी थी| कहानी प्रोफेसर एवं वैज्ञानिक प्रभाकर के मनोविज्ञान को दर्शाती है क्योंकि वे एक बड़े वैज्ञानिक होते हुए दुनिया उन्हें मित्रहन्ता समझती है| वे अपनी जीवन की स्थितियों को अपने मित्र दिवाकर को बताते है| प्रो.प्रभाकर ने एक बड़ा शोधकार्य करके ‘कालयान’ बनाया जिसको लोग केवल एक कल्पना समझकर मजाक उड़ाते थे|प्रो.प्रभाकर का दोस्त निरंजन भी एक वैज्ञानिक है और कई सालों से अनुसन्धान कर रहा है|निरंजन को एक ऐसे धातु की खोज है जो मजबूत है और जिसके अंदर आग सहने की क्षमता भी है| निरंजन को विश्वास है कि जब ऐसी धातु भविष्य में धरती पर मौजूद है तो आज भी कहीं न कहीं अवश्य होगी| निरंजन को प्रभाकर के कालयान का पता चलता है तो वे उनसे मिलकर कालयान में बैठकर उस धातु की खोज के लिए निकल पड़ता है| सभी वैज्ञानिक निरंजन एवं कालयान वापसी का इंतजार करते है| प्रभाकर ने कालयान बनाने में काफी मेहनत की थी फिर भी वे चिंता में थे| कालयान जब धरती पर आ जाता है तो पता चलता है कि निरंजन को धातु मिलती है लेकिन उनकी मृत्यु हो जाती है| प्रभाकर का गुणगान करनेवाले सब उनको हत्यारा बोलने लगते है| प्रभाकर दिवाकर को सब बताता है तो दिवाकर उस धातु और कालयान का अध्ययन करके निरंजन की मृत्यु का शी कारण ढूंढता है| वह साबित करता है कि निरंजन की मृत्यु रेडियोधर्मिता के कारण हुई है| रेडियोधर्मिता जिसकी समस्या वर्तमान में बढ़ रही है जिसकी तरफ संकेत लेखिका करना चाहती है| रेडियोधर्मि किरणे मनुष्य के लिए घातक सिद्ध हो रहे है| अल्फा,बीटा और गामा कण जो आणविक विद्युतीकरण के द्वारा बनते है वे रेडियोधर्मिता के स्रोत है| रेडियोधर्मिता की खोज हेनरी बैक्केरेल,मैडम क्यूरी और पिपरे क्यूरी ने संयुक्त रूप से की थी जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला था|
 अर्चना शर्मा की कहानी ‘सूरज की मौत के बाद’ मई 1986 में विज्ञान प्रगति पत्रिका में छपी थी| लेखिका ने इस कहानी में दूसरी दुनिया की कल्पना की है| एक ऐसे ग्रह की कल्पना जहाँ मानव जीवन सृष्टि है साथी ही वहाँ के वैज्ञानिक विकास का भी चित्रण किया है| कहानी आत्मकथात्मक शैली में लिखी है| मै अर्थात कथा नायिका,अपर्णा और अनुराग तीनों का दल आकांक्षा नामक अन्तरिक्ष यान से एक रहस्यमय पिंड या ग्रह पर उतरता है| उस ग्रह का नाम है दरकागू जिसका अर्थ है- अँधरे का ग्रह| उस ग्रह पर ऑक्सीजन,सूरज की रोशनी,पेड़ कुछ भी नहीं है| तीनों के मन में एक जिज्ञासा निर्माण हो जाती है कि वहाँ ऊर्जा के स्रोत क्या है| वहाँ उनको एक दारक्या  नामक प्राणी मिलता है| तीनों लोग पृथ्वी पर उपलब्ध सभी प्रकार के ऊर्जा स्रोतों की जानकारी दारक्या को देते है| वे उसे पेट्रोल.पाणी,कोयला,सूर्य,पेड़ सभी का ज्ञान देते है जिससे पाठकों के ज्ञान को भी बढ़ावा मिलता है| दारक्या तीनों को उनके ग्रह का ऊर्जास्रोत बताता है| तीनों को जानकारी मिलती है कि उस ग्रह में छिपकलीनुमा जीव है उनके अंदर लाल,नीले,पीले तार घुसें हुए है उसको वे लोग ‘टारगूरा’ कहते है| तीनों लोग दो साल वहाँ रहकर दरक्या को ‘बायोटेक्नोलॉजी’ का ज्ञान देते है| कहानी मनोरंजन तो करती ही है साथ ही ज्ञान भी बढ़ाती है|
 डॉ.शशि सिंह की कहानी ‘भविष्य का भूत’ जिज्ञासा पत्रिका में सन 2000 में छपी थी| कहानी बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हुए परिवर्तनों और बहुक्षेत्रीय विकास पर प्रकाश डालती है| चिकित्सा,शिक्षा,जीवन शैली,संस्कृति सभी में परिवर्तन हुआ हैं| चिकित्सा के क्षेत्र में तो मनुष्य ने अभूतपूर्व क्रांति की है| जैवप्रौद्योगिकी का विकास हुआ है| कहानी इसी के सुफलों पर प्रकाश डालती है| कहानी के दो पात्र वाणी और संयुक्ता के बीच हो रहे वार्तालाप से इसकी समग्र जानकारी मिलती है| लेखिका कहानी के माध्यम से यह स्पष्ट करती है कि बीसवीं सदी के मध्यकाल में वैज्ञानिकों द्वारा डी.एन.ए.की संरचना की खोज हुई उसके बाद आनुवांशिकी के क्षेत्र में प्रगति हुई| मानव और अन्य कई प्राणियों के हर गुण के लिए जीन या जीन समूह की पहचान की गई और इक्कीसवीं सदी  में जीनोम की पूरी जानकारी मानव के पास है| चिकित्सा क्षेत्र में प्रगति के कारण मृत्युदर कम हुई| लोग 60 के बाद भी सक्रिय रहते है| मानव ने काफी हद तक संक्रामक रोगों पर काबू पा लिया है| कहानी के उत्तरार्ध में लेखिका ने जनसंख्या एवं पर्यावरणीय प्रदुषण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दें सामने रखे है जिसको नियंत्रित करने के लिए शिक्षा के महत्व को स्थापित किया है|
   विज्ञान कथा लेखन साहित्यिक समीक्षा के क्षेत्र में उपेक्षित है| विज्ञान कथा साहित्य का मूल्याकंन करके साहित्य जगत में उसको उचित स्थान देकर तथा पाठ्यक्रम में इसका समावेश करके विज्ञान कथा साहित्य को समृद्ध किया जा सकता है|

एम.फिल वालों से जान छूट गई

 

पुणे विश्वविद्यालय से पढ़े सभी को सादर समर्पित.....  


एम.फिल वालों से जान छूट गई
‘न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी’ इस कहावत को आपने सुना ही होगा| आज इस कहावत को याद करने का कारण है नई शिक्षा नीति में ‘एम. फिल’ बंद करने का निर्णय| इस निर्णय के बाद कई विश्वविद्यालय के प्रशासन ने इस कहावत को याद किया होगा| हालाँकि यह निर्णय स्वागत योग्य है| इस संदर्भ में शिक्षा क्षेत्र के विद्वानों को पूछने की आवश्यकता नहीं है| सामान्य विद्यार्थी भी यही सोचते है नेट-सेट परीक्षा और पीएचडी के सामने भला इस डिग्री का क्या महत्व है ? अभी- अभी तो ‘नई शिक्षा नीति’ को केबिनेट ने मंजूरी दी है इसलिए इस पर चर्चा तो होगी| मेरे इस लेख का कारण कुछ और ही है...
    मुझे पुणे विश्वविद्यालय के वे दिन याद आ रहे है जब मैंने वहाँ से एम्.ए. किया था| विश्वविद्यालय में बहुतांश विद्यार्थी ग्रामीण भागों से आते है| ग्रामीण भागों में रोजगार और कृषि क्षेत्र की स्थिति देखकर विद्यार्थी उच्च शिक्षा को महत्व देते है| पुणे विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आए इन ग्रामीण भागों के विद्यार्थियों के लिए ‘कमवा आणि शिका योजना’ (Earn and Learn Scheme) का बहुत आधार मिलता है| इस योजना में रोज तीन घंटे की साफ़-सफाई या कुछ कार्यालयीन काम से विद्यार्थियों को कुछ रूपये मिलते है जिससे उनका महीने का रहने-खाने का इंतजाम हो जाता है| समस्या यह है एम्.ए. के दो साल होने के बाद इस योजना में विद्यार्थियों को फिर से प्रवेश दिया नहीं जाता और विश्वविद्यालय का छात्रावास अर्थात होस्टेल का कमरा भी खाली करना पड़ता है| इसमें प्रशासन की कोई गलती नहीं है| वह अपनी जगह सही है| समस्या विद्यार्थियों के सामने खड़ी होती है| एम्.ए के बाद कुछ समय के लिए ही क्यों न हो विश्वविद्यालय में रहने का मौका मिले जिससे नेट-सेट या अन्य स्पर्धा परीक्षा की तैयारी हो अथवा जॉब ढूंढने में आसानी हो| अब गाँव में जाकर यह सब तो संभव नहीं हो सकता|
ऐसे समय में उनका ध्यान एम्. फिल के प्रवेश पर ही रहता है| एम् ए होने बाद जैसे ही छात्रावास अर्थात हॉस्टेल से कमरा खाली करने की नोटिस आती है तो एम्. फिल के प्रवेश बल पर उसी कमरे पर अपना निर्विवाद अधिकार हो जाता है, इसलिए रहने की समस्या तो दूर हो जाती है| अब रही आर्थिक समस्या तो एम्.फिल के विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय के द्वारा ‘स्टाइपेंड’ मिलता है| हालाँकि इसके लिए भी विद्यार्थियों को संघर्ष करना पड़ता है| कई बार विश्वविद्यालय प्रशासन के द्वारा यह ‘स्टाइपेंड’ रोक दिया जाता है| अगर मैं मेरी बात करूँगा तो हमने पुणे विश्वविद्यालय में इस एम्.फिल के ‘स्टाइपेंड’ के लिए वाइस-चांसलर के कार्यालय के सामने आन्दोलन किया था|  ‘स्टाइपेंड’ के लिए चार दिन के इस आन्दोलन के बाद एम्.फिल का ‘स्टाइपेंड’ सुरु हुआ था| इस आन्दोलन में सभी विद्यार्थी ग्रामीण भागों के ही थे|
  एम् फिल की इन सुविधाओं का कुछ विद्यार्थी गलत इस्तेमाल भी करते थे| एम्.फिल का ‘स्टाइपेंड’ लेकर शोध कार्य ही नहीं करते थे| या तो बीच में ही एम्.फिल छोड़कर पीएचडी करते थे|  एम् फिल का कारण देकर 6-6 साल हॉस्टेल छोड़ने का नाम ही नहीं लेते थे| इन सबसे विश्वविद्यालय का प्रशासन तो परेशान हो ही जाता था साथ ही विभाग के प्राध्यापक भी परेशान हो जाते थे| वैसे भी इस दौरान कई विद्यार्थी पढ़ाई कम और विभाग की राजनीति में ही उलझ जाते थे| मेरे साथ के काफी विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय का 36000/- रूपये लेकर एम् फिल का काम काफ़ी जद्दोजहद के बाद  क्यों न हो पूरा किया| प्रशासन के कड़े प्रावधानों के बाद भी कई विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय रूपये डूबा दिए| कम से कम हमारे ऊपर तो वह बोझ नहीं रहा हैं| हालाँकि विद्यार्थियों की भी अपनी समस्याएँ रहती है और विश्वविद्यालय के कुछ प्राध्यापक भी विचित्र ढंग के विद्वान होते है| वे भी विद्यार्थियों के एम् फिल शोध में रूचि नहीं लेते| दो-तीन घंटे विद्वान प्राध्यापक महोदय के केबिन के सामने खड़े रहकर बेचारे विद्यार्थी भी परेशान हो जाते है| इसलिए भी काम पूरे नहीं होते| हालांकि सभी के लिए जिम्मेदार विद्यार्थी ही माने जाते है वो बात अलग है|   
खैर बाते बहुत है... अब तो सरकार ने एम्.फिल बंद करके विश्वविद्यालय के प्रशासन और विद्वान प्राध्यापकों का बरसों का सिरदर्द हमेशा के लिए मिटा दिया है| अब तो भाई... मैंने सुना है चार साल का ग्रेज्युएट कॉलेज में ही होगा तो विश्वविद्यालय में एम्. ए. केवल एक साल का ही होगा क्या ? होगा तो अच्छी बात है विश्वविद्यालय के प्राध्यापक को एक ही क्लास को पढ़ाना पड़ेगा| मैं उनकी बात कर रहा हूँ जो प्रत्यक्ष साक्षात् कक्षा में विराजमान होकर पढ़ाते है या कभी-कभी क्यों न हो विद्यार्थियों को दर्शन देते है| एम्. फिल बंद करके जो प्रथम वर्ष में पढ़ाई जानेवाली अनुसंधान कार्यपद्धति अर्थात ‘रिसर्च मेथोडोलोजी’ कॉलेज के विद्वान् ही संपन्न करेंगे क्या ? विश्वविद्यालय में केवल पीएचडी के तथा उसके समकक्ष अन्य शोधकार्य होंगे जो अच्छी पहल है|
शिक्षा व्यवस्था का भविष्य जो भी हो फिलहाल एम.फिल. बंद करके विश्वविद्यालय प्रशासन और विभाग के प्राध्यापकों की एम.फिल वालों से जान छूट गई  है| इसमें कोई दो राय नहीं है|
                                                                 प्रशांत देशपांडे                                             

शनिवार, 5 सितंबर 2020

अँनिमल फार्म – जॅार्ज ऑरवेल

 

जॅार्ज ऑरवेल का नाम अंग्रेजी के साहित्यिक क्षेत्र में काफी चर्चित रहा है| उनका महत्वपूर्ण उपन्यास ‘अँनिमल फार्म’ के विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुए है| इस उपन्यास का मराठी अनुवाद श्रीकांत लागू जी ने किया है| कुछ वर्ष पहले मैंने इस उपन्यास पढ़ा था लेकिन इसपर कुछ लिखने का मौका नहीं मिला था| इस उपन्यास पर काफी चर्चा साहित्यिक क्षेत्र में हुई है| यहाँ मैं मेरी दृष्टि से इस पर टिप्पणी करना चाहता हूँ .....

     दरअसल इस उपन्यास को समझने के लिए हमें मार्क्सवादी विचारधारा  और उसके प्रभाव को पहले समझना होगा| यह सर्वस्वीकृत है कि उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के वैश्विक परिदृश्य को मार्क्सवाद ने बहुत प्रभावित किया| यूरोपीय देशों में औद्योगीकरण के विकास के बाद पूँजीवादी ताकदों का वर्चस्व बढ़ा था साथ ही साम्राज्यवादी प्रवृत्तियां भी बढ़ रही थी| ऐसे समय में समाज के सर्वहारा वर्ग का शोषण बड़े पैमाने पर हो रहा था| मजदूर वर्ग की स्थिति बदतर हुई थी| इसलिए समाज में दो वर्ग बन गए थे शोषक और शोषित| इस स्थिति में मार्क्स ने वर्गविहीन समाज की कल्पना की और अपने साम्यवादी विचार व्यक्त किए| जिसको समझने के लिए उनके सिद्धांतों को समझना होगा जैसे द्वन्द्वात्मक भौतिक विकासवाद, मानव सभ्यता के इतिहास की व्याख्या, अतिरिक्त मूल्य सिद्धांत आदि| 

मार्क्स ने कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र में भी कहा है कि समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है| उन्होंने स्पष्ट किया किया कि इतिहास में मनुष्य की प्रारम्भिक अवस्था साम्यवादी ही थी बाद में दास प्रथा, सामन्तवादी युग में दो वर्ग बने और शोषण चक्र चलता रहा| औद्योगीकरण के विकास के बाद पूँजीवादी वर्ग मजदूरों का शोषण कर रहा है इसलिए ‘दुनिया के मजदूरों, एक हो’ इस घोषणा के साथ उन्होंने शोषक व्यवस्था के खिलाफ क्रान्ति की बात की जिससे उत्पादन के साधनों पर सर्वहारा वर्ग का वर्चस्व होगा| वर्गविहीन समाजव्यवस्था होगी जिसमें अधिकार तो राज्य के हाथ में होगे और समाजवाद स्थापित होगा बाद में राज्य की सत्ता भी नष्ट होकर साम्यवाद स्थापित होगा| यही मार्क्स का सपना था|

कार्ल मार्क्स के विचारों ने विश्व स्तर की राजनीति, अर्थनीति एवं साहित्य को प्रभावित किया| इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर रशिया में सन 1917 में क्रांति हुई| जिसको बोल्शविक क्रन्ति कहा जाता है| निरंकुश झार सत्ता को समाप्त करके लेनिन के नेतृत्व में कम्युनिज्म की सत्ता स्थापित हुई| सन 1924 में लेनिन की मृत्यु होने के बाद सभी सूत्र स्टैलिन के हाथ में आ गए| स्टैलिन ने सोवियत  रशिया में तानाशाही की तरह सत्ता चलाना प्रारंभ किया| हालाँकि इनके नेतृत्व में रशिया का विकास हुआ लेकिन समाजवादी मूल्य स्थापित नहीं हो पाए| राज्य को पूरी तरह से नियंत्रण में रखकर प्रशासन को अपने ढंग से चलाया गया| अपने विरोधी विचारों को तानाशाही से समाप्त कर दिया गया| इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि स्टैलिन के सामाजवाद ने भी हिटलर की तानाशाही की तरह   समस्त मानवतावाद को कुचल दिया|

उपर्युक्त सभी विश्लेषण के आधार पर ही इस उपन्यास को समझना होगा| जॅार्ज ऑरवेल ने रशिया की स्टैलिन की सत्ता को नजदीक से देखा था| ‘अँनिमल फार्म’ उपन्यास में उन्होंने स्टैलिन के समाजवादी परदे के पीछे के तानाशाही का यथार्थ चेहरा समाज के सामने रखा| इस उपन्यास की विशेषता यह है कि यह एक रूपकात्मक उपन्यास है| कही पर भी स्टैलिन या उस समय से जुड़े ऐतिहासिक व्यक्तियों के नाम नहीं है| यह एक प्राणियों की कथा हैं| कुल दस भागों में विभाजित इस उपन्यास में सत्ता के वैश्विक सत्य को लेखक ने सामने रखा है| उपन्यास में एक मनोर फ़ार्म है जिसका मालिक जोन्स है| जोन्स के इस फ़ार्म में बहुत प्राणी रहते है| जोन्स इन प्राणियों पर बहुत अत्याचार करता है| सभी प्राणी इस अत्याचार को सहने के लिए मजबूर रहते है| एक दिन उस प्राणी समूह में  उम्रदराज एक सूअर बुढा मेजर एक रात सपना देखता है जो अपने देखे सपने के बारे में सभी प्राणियों को बताना चाहता है| दुसरे दिन वह सभी प्राणियों को इकट्ठा करके अपने देखे सपने के बारे में बताता है| मनोर फार्म के सूअर, कुत्ते, बिल्ली, मुर्गियां, घोड़े, बकरियाँ, गधे, गौए, चूहे आदि सभी प्राणी वहां उपस्थित रहते है| बुढा मेजर सबको समझाता है कि मनुष्य के द्वारा प्राणियों का कितना शोषण किया जा रहा है जिसको समाप्त करने के लिए सभी प्राणियों को क्रांति करनी होगी जिससे प्राणियों की सत्ता स्थापित होगी| हमें हमारे हक़ और अधिकार मिलेंगे| बुढा मेजर को विश्वास था कि एक समय यह सपना पूरा होगा| तीन दिन के बाद उसकी मृत्यु हो जाती है|

बुढा मेजर के इस क्रांति के विचारों से सभी प्राणी प्रभावित हुए| प्राणियों में तीन सूअरों को – नेपोलियन, स्नोबोल और स्किलर को अधिक सम्मान था| अत: क्रांति की जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर थी| इन तीनों के आज्ञाकारी विद्यार्थी थे दो घोड़े – बोक्सर और क्लोव्हर| जोन्स हमेशा अपने बंगले पर रहते थे और सभी प्राणी भूखे मरते थे| एक दिन सभी प्राणी क्रांति करते है| मनोर फ़ार्म पर अपना कब्जा करते है| मालिक जोन्स उस मनोर फ़ार्म से भाग जाता है और क्रांति सफल हो जाती है| दुसरे दिन नेपोलियन और स्नोबोल आगे की योजना सबको बताते है| मनोर फ़ार्म शब्द हटाकर वहां ‘अॅनिमल फार्म’ लिखा जाता है| स्नोबोल दीवार पर सात आज्ञाएँ लिखी जाती है| जैसे कोई भी प्राणी बंगले में नहीं रहेगा, शराब नहीं पिएगा, एक प्राणी दुसरे प्राणी को मित्र समझेगा आदि| इसमें एक सबसे महत्वपूर्ण है कि “सभी प्राणी समान है”|

क्रांति की सफलता से सभी प्राणी खुश हो जाते है और अपने सुखी जीवन की कल्पना करते है लेकिन बाद में नेपोलियन, स्नोबोल और स्किलर का महत्व बढ़ने लगता है| ये सूअर कभी काम नहीं करते थे केवल योजनाएं बनाते थे बल्कि फार्म के सभी प्राणी दिनभर मेहनत करते थे| इसमें समय के साथ-साथ नेपोलियन का वर्चस्व बढ़ने लगा| उसने कुछ कुत्तों को अपनी सुरक्षा के लिए अपने साथ ही रखा था| नेपोलियन पवनचक्की बनाना चाहता है जिसमें सभी प्राणियों से अधिक मेहनत करवायी जाती है| हालाँकि पवनचक्की की योजना स्नोबोल की ही थी जिसको फार्म से निकालकर नेपोलियन उसको अपनी योजना मानता है| क्लोव्ह्र्र नेपोलियन की सभी बाते कैसे सही है इसी जुगाड़ में रहता है| सभी प्राणी निष्ठा के साथ नेपोलियन का साथ देते है लेकिन समय के साथ साथ उनके सामने यथार्थ स्थितियाँ आने लगती है| किसी भी मनुष्य से संबंध नहीं रखना है यह तह होते हुए भी नेपोलियन व्हिम्पर नामक दलाल से संबंध जोड़ता है| अपने आस पास के फ़ार्म के मालिक विलकिंगटन और फ्रेडरिक से व्यापारिक संबंध स्थापित करता है| इतनाही नहीं सभी सूअर बंगले में रहने लगते है| फ़ार्म में जितने भी काले कारनामे किए जाते है वे सब स्नोबोल के माथे मढ़ दिए जाते है| ‘अॅनिमल फार्म’ में अब प्राणियों की स्थिति बहुत ही दर्दनाक हो जाती है| नेपोलियन फार्म के दूध, अंडा जैसे सभी उत्पादन को बिना चर्चा के बाहर बेच देता है| स्वयं को प्राणीरत्न, प्राणीभूषण उपाधियाँ देता है| विरोध करनेवाले प्राणियों को वह खुद ही मार डालता है| वह फार्म की लकड़ी फ्रेडरिक को बेच देता है जिसमें जाली नोट देकर फ्रेडरिक नेपोलियन को फँसाता है| नेपोलियन फ्रेडरिक को मृत्युदंड की शिक्षा सुनाता है| नेपोलियन और साथी सूअर कुछ कुत्तों की सुरक्षा से बंगले में शराब भी पीते रहते है| बोक्सर को भी उसके अंतिम क्षणों में कत्तलखाने भेज दिया जाता है| नेपोलियन विरोध करनेवालों को अपने कुत्तों से मरवा देता था| फ़ार्म में सूअरों के बच्चों के लिए खान पान तथा शिक्षा की अलग व्यवस्था की जाती है बल्कि अन्य प्राणी भूखे मरते रहते है| अब नेपोलियन के साथ सभी सूअर दो पैरों पर चलने लगते है| उनकी अपने आस-पास के फ़ार्म मालिकों से, जमींदारों से आर्थिक विषयों पर चर्चा होती रहती है| वे पत्ते खेलते रहते है| सब प्राणी जब बंगले में देखते है उनको सूअरों में और उन शोषक मनुष्य में कुछ भी अंतर दिखाई नहीं दे रहा था|  

सभी प्राणी सोचने के लिए मजबूर हो जाते है कि इसलिए की थी हमने क्रांति ? बुढा मेजर का सपना यही सब देखने के लिए था ? कई सवाल खड़े होते है| लेकिन तानाशाह नेपोलियन को कोई पूछ भी नहीं सकता| सभी प्राणी अपना हमेशा का क्रान्ति गीत ‘जानवर इंग्लैंड के’ गाकर आदर्श सामाजिक व्यवस्था का चित्र देखते रहते है|

 अँनिमल फार्म’ की एक महत्वपूर्ण आज्ञा बदल दी जाती है लिखा जाता है “सभी प्राणी समान है लेकिन कुछ प्राणी औरों से अधिक समान है”

उपन्यास में बुढा मेजर ही कार्ल मार्क्स है तथा नेपोलियन स्टैलिन है| नेपोलियन के कुत्तों को हम पोलिस प्रशासन व्यवस्था कह सकते है जिनका इस्तमाल ही अपना दबाव रखने के लिए राजनेता करते है| लेनिन के समय से ही एक आदर्शवादी विचारक थे ट्राटस्की यही इस उपन्यास के स्नोबोल है| क्लोवर को राजनीतिक दलाल कह सकते है| विलकिंगटन और फ्रेडरिक सभी पूंजीवादी व्यवस्था को दर्शाते है|  और रहे सभी भूखे गरीब प्राणी ये वही सर्वहारा है जिनकी मुक्ति के लिए क्रान्ति का परचम लहरा गया था|

कुछ स्वार्थी और तुच्छ उद्देश्यों को लेकर जीने वाले लोग कभी कार्ल मार्क्स के सपनों को पूरा नहीं कर सकते| ऐसी क्रांति से एक शोषक व्यवस्था समाप्त होकर दूसरी शोषक व्यवस्था स्थापित होती है| वर्ग विहीन और शोषण मुक्त समाज बनाने के लिए पहले समाजवादी मूल्यों को गहराई से समझना होगा| रशिया और चीन को छोड़ो भारत में भी इस विचारधारा से प्रभावित बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है लेकिन इनमें कितने सही अर्थ में इस विचारधारा में निष्ठा रखते है और कितने झूठा मुखौटा पहनकर नारे लगाते है इसका मूल्यांकन भी होना चाहिए|       

                                        प्रशांत देशपांडे


बुधवार, 10 जून 2020

कहानी ...आखिरी मुलाकात

आज मैंने एक कहानी लिखी ...आप सबको कैसी लगी  जरूर बताना
                        आखिरी मुलाकात
      ‘प्रणाम पंडित जी.. पालागी..’ सुबह जैसे ही मंदिर से बाहर निकला तो दूर से किसी ने आवाज दी। आवाज जानी पहचानी लग रही थी। मैं रुक गया। पीछे मुड़कर देखा तो कोई नहीं था। फिर मंदिर के गेट के पीछे देखा तो पता चला अरे.. यह तो रमवा है.. यह वही है जिसका स्टेशन के बाजू में वडा पाव का ठेला है। लगभग दो महीने बाद मिले थे हम। मैं भी दो महीने बाद मंदिर में भगवान के दर्शन करने गया था। हालांकि मंदिर तो बंद ही था। सामने के बेंच पर दो-चार दर्शनार्थी बैठे थे। लगभग ढाई महीने के लॉक डाउन के बाद थोड़ी सी चहलकदमी दिखाई दे रही थी। मंदिर के ठीक सामने स्टेशन पर दो लोकल ट्रेनें खड़ी थी। स्टेशन के बाजू में मुंबई में काम पर जाने वाले चिकित्साकर्मी और अत्यावश्यक सेवा देने वाले लोग सामाजिक दूरी को ध्यान में रखकर और मास्क लगाकर बेस्ट का इंतजार कर रहे थे। छोटे दुकानदारों ने अपनी दुकान खोलना शुरू किया था। हमेशा की तरह भीड़ भाड़ नहीं थी। लेकिन सुबह हुई बारिश ने वातावरण को थोड़ा सहज बना दिया था। बहुत दिन के बाद मंदिर आने के कारण मेरा भी मन शांत था। भगवान का दर्शन करके मैं भी अपने विचारों में डूब गया था। उसी समय इस रमवा ने आवाज देकर मेरे विचारों के पुल तोड़ दिए।
     लगभग एक डेढ़ साल हुए होगे रमवा से मेरी पहचान हुई थी। जब मैं सुबह की लोकल पकड़ने स्टेशन पर जाता था तो मुझे रमवा दिखाई देता था। स्टेशन के बाजू में ही उसका वडा पाव का ठेला था। सुबह तो समय नहीं मिलता था लेकिन शाम को घर लौटते समय मैं उसके ठेले पर वडा पाव खाने के लिए जाता था। इधर उधर की बातें भी होती थी। आज जब वह मुझे मंदिर के गेट पर मिला तो मैंने भी उसी के अंदाज में कहा
 "अरे रमवा.. कईसन हो.. ठीक बा.." 
उसने भी हमेशा की तरह हंसते हुए कहा
 "आप भी ना.. पंडित जी.. हमारी भासा का मजाक उड़ाते हो"  इतना ही कह कर वह हंसते हुए चला गया। मैं भी हंसते हुए वहां से निकला और दूध की थैली लेकर घर चला आया।
          जब से लॉक डाउन हुआ है, सोसाइटी में दूधवाला आता ही नहीं है। मैं सुबह जैसे ही दूध लाने दुकान पर गया वहीं एक स्टूल पर रमवा बैठा था। दूध की थैली बैग में डालकर मैंने उसको पूछा
"कैसे हो भाई.. कल मंदिर में मैं जल्दी में था.. तो बात नहीं हो पाई थी" मेरे वाक्य पर रमवा केवल हां में हां मिलाकर शांत बैठ गया था। हमेशा गप्पे लड़ाने वाला और गांव के किस्से बताने वाला रमवा उस दिन मुझे बहुत बदला बदला हुआ लग रहा था। एकदम शांत जैसे किसी अवसाद में डूबा हुआ। जब से उसका वडा पाव का ठेला बंद हुआ है, वह रोज सुबह इसी दूध के दुकान पर एक स्टूल पर बैठा रहता था। मैं भी रमवा के साथ बहुत बातें करना चाहता था। मैंने भी कुछ सहज होकर कहा
 "और बताओ रमवा.. क्या हाल है" 
मेरे ऐसे पूछने पर रमवा ने कहा
"का बताएं पंडित जी.. ई लाक डाउन ने तो हमें कहीं का नहीं छोड़ा"  उसके इस उदासी भरे वाक्य पर मैंने उसको धीरज देते हुए कहा
 "अरे.. अब तो सब शुरू हो रहा है... तेरा वडा पाव का ठेला भी तो शुरू होगा।" मैं उसकी प्रतिक्रिया जानना चाहता था। लेकिन उसने केवल क्या बताएं आपको पंडित जी कहकर दोपहर का खाना बनाने की बात कहकर जाने लगा। तो मैंने जाते समय उस को पूछा
"क्यों भाई.. भाभी नहीं बनाती खाना" 
इस पर उसने बहुत ही ठंडे पन से कहा
 "उसको पांचवा महीना चल रहा था ..तो मैंने उसको गांव भेज दिया"
" ऐसी स्थिति में इतना दूर भेजने की क्या जरूरत थी"
 मैंने मेरी आशंका जताई। फिर दुबारा पूछने के बाद उसने अपनी समस्या मुझे बताई।
            दरअसल कुछ साल पहले के भैया और भाभी गांव से मुंबई आए थे। वह किसी बिल्डर के पास दिहाड़ी मजदूरी का काम करते थे। एक डेढ़ साल पहले रमवा भी अपने भाई के पास गांव से मुंबई आया था। यहां स्टेशन के बाजू में वडा पाव बेचता था। तीनों काम करते थे इसलिए अच्छी आमदनी भी होती थी। एक चॉल में किराए पर रहते थे। सब कुछ ठीक चल रहा था। इसलिए रमवा ने भी अपनी नई नवेली दुल्हन को गांव से मुंबई लाया था। रमवा, भाभी, भैया सब काम पर जाते थे तो रमवा की पत्नी घर का काम संभालती थी। मेहनती परिवार एक सामान्य जीवन तो जी ही रहा था। लेकिन बीच में इस कोरोना महामारी के कारण लॉक डाउन हुआ। बिल्डिंग के काम बंद हुए। भैया, भाभी घर बैठ गए। उन पर भी एक बच्चे की जिम्मेदारी भी थी। रमवा का वडा पाव का ठेला भी बंद था। उसकी पत्नी भी गर्भवती थी। घर की आर्थिक स्थिति दिनों दिन बदतर होती गई। जैसे ही श्रमिक ट्रेन शुरू हुई, भैया भाभी ने गांव जाने का निर्णय ले लिया। रमवा ने भी अपनी पत्नी को उनके साथ गांव भेज दिया। तब से विगत दो हफ्ते से रमवा अकेला ही रह रहा है। उसकी स्थिति देखकर मुझे भी दुख हो रहा था। इसी अकेलेपन के कारण वह दूध की दुकान पर आकर बैठा रहता था।
उसकी स्थिति को समझते हुए मैंने उसको कहा
"भैया, भाभी का ठीक था.  लेकिन आपको अपनी पत्नी को ऐसी स्थिति में इतनी दूर गांव नहीं भेजना चाहिए था।" मेरे इस वाक्य पर रमवा ने कहा
"क्या है ...पंडित जी पत्नी को पांचवा महीना चल रहा था.. यहां के डॉक्टर ज्यादा पैसा लेते हैं.. सरकारी अस्पताल तो कोरोना मरीजों से भरे है.. मैं बहुत डर जाता हूं।"
       मैं उसकी स्थिति को समझ रहा था। दरअसल सरकारी अस्पताल कोरोना मरीजों से भरे हैं और एक गरीब व्यक्ति प्राइवेट डॉक्टर की फीस कहा से देगा ?
मैंने विषय बदलते हुए कहा
"तो कब शुरू कर रहे हो ..तुम्हारा वडा पाव का ठेला"
इस पर रमवा ने नाराज होकर कहा
 "अब क्या बताएं पंडित जी... इसके लिए ही रुके थे हम इतने दिन यहां... नहीं तो भैया के साथ नहीं जाते गांव।" रमवा ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि
 "इस ठेला गाड़ी और जगह का मालिक मराठी है और अब यहां कोई मराठी संगठन के लोग वड़ा पाव बेचने वाले हैं। कल ही कोई कह रहा था कि.. सब भैया लोग गांव भाग गए... अब मराठी लोग काम करेंगे..."
उसके इस वाक्य पर मेरे पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं था। मैं सब सुनकर चुपचाप वहां से निकल गया।
        अगले दिन जब वह मुझे मिला तो बहुत ही परेशान था। मुझे लगा कुछ आर्थिक परेशानी होगी। मैंने भी संवेदनाओं के साथ उसको कहा
 "कुछ समस्या है तो बताना रमवा.. कुछ ना सही दाल– चावल , खाने–पीने का इंतजाम तो कर ही सकते हैं"
मेरे इस वाक्य पर दुख भरी उदास हंसी के साथ उसने कहा
 "नहीं.. नहीं पंडित जी.. ऐसी कोई बात नहीं है.. बस बहुत खाली-खाली लग रहा है.. ठेला लगाने का काम  मिलना अब मुश्किल ही लग रहा है।" 
 मैंने उसकी तरफ गौर से देखा। सचमुच हमेशा हंसते रहने वाला रमवा की आंखे डबडबाई हुई थी। शायद उसको अपनी पत्नी, भैया और भाभी की याद आ रही होगी। मैंने सोचा मजबूरी कितनी बुरी चीज है। हमारा पेट ही हमें अपने गांव से दूर कर देता है। गांव में कुछ काम नहीं मिलता इसलिए तो हमारा पेट हमें यहां लेकर आता है। खैर.. अपने गांव वापस जाने का निर्णय रमवा ले चुका था। उसने मुझे कहा था कि कल शाम की श्रमिक ट्रेन से मैं गांव जा रहा हूं। मैं भी एकदम शांत हो गया था। शाम को जा रहा है इसलिए सुबह उसकी मुलाकात होगी ऐसा सोचकर जब मैं दूसरे दिन दूध की दुकान पर गया तो वहा रमवा  नहीं था। मैंने दूधवाले से पूछा तो उसने बताया वह तो सुबह की श्रमिक ट्रेन से गांव चला गया.. आपको नहीं बताया उसने। मैंने कुछ जवाब ना देकर उसको फोन किया लेकिन उसका फोन नहीं लग रहा था। मैं दूध की थैली लेकर घर आया। मुझे याद है जाने के पहले दिन जब रमवा मिला था तो उसने मुझे कहा था "अब गांव जाऊंगा तो वापस नहीं आऊंगा.  भैया, भाभी भले आ जाए..मैं नहीं आऊंगा.. वहीं कुछ काम धंधा देख लूंगा।" मुझे उसके वाक्य बार-बार याद आ रहे थे।
         आठ-दस दिन हुए हैं। जब भी मैं दूध लेने जाता हूं तो मुझे रमवा की याद आती है। आज वह अपने गांव अपने परिवार के साथ होगा। उसने मुझे एक बार कहा था "पंडित जी.. आप एक दिन हमारे गांव जरूर आना। वहां हमारे दो बीघा खेत है.. जो पिताजी देखते हैं.. उसने मुझे उत्तर प्रदेश का कुछ गाजीपुर नाम का गांव बताया था। मुझे तो नहीं पता.. मैं तो कभी उत्तर प्रदेश गया नहीं हूं। लेकिन उसने गांव का बहुत वर्णन मेरे सामने किया था।       
         पता नहीं क्यों रमवा के साथ मेरे इतने भावनात्मक संबंध जुड़े थे। हमारा कोई रिश्ता तो था नहीं फिर भी अपनापन क्यों निर्माण हुआ था। उस दिन दिनभर उसकी याद आती रही।
      कुछ दिन बाद मुंबई अपने पटरी पर वापस आएगी। लोकल शुरू होगी... जीवन की भागदौड़ शुरू होगी.. बस स्टेशन के बाजू में रमवा के हाथ का वडा पाव मुझे नहीं मिलेगा और उसका हंसते हुए हमेशा पूछना...
 प्रणाम पंडित जी..पालागी.....
                                                        प्रशांत देशपांडे

शुक्रवार, 5 जून 2020

कविता – फेसबुक के झुंड

फेसबुक के झुंड

हम शांत हैं
हम खामोश हैं
हम मौन हैं
शब्द चाहे कोई भी चुन लीजिए आप
सच्चाई यही है कि हम बोलना नहीं चाहते कभी भी

कहीं कुछ भी होता है घटित
हम तुरंत हाजिर हो जाते हैं यहां
लिख देते हैं बड़े-बड़े लेख और कविताएं
जताना चाहते हैं अपनी संवेदना या
दिखाना चाहते हैं अपनी सृजनात्मक प्रतिभा
उड़ेल देते हैं अपनी विद्वत्ता
उलझा देते हैं शब्दों के मायाजाल में उन पाठकों को
जो कुछ समय बिताकर यहां से चले भी गए हैं

कुछ समय बाद हम फिर आते हैं
इसी आभासी दुनिया में
लाइक और कमेंट की गिनती करने
खुद ही मोहर लगा देते हैं अपनी योग्यता पर
जैसे मिला है प्रमाण पत्र लेखक कवि होने का

डटे रहते हैं इसी दुनिया में दिनभर
मंडराते रहते हैं एक दूसरे की वॉल पर
यहीं तक सीमित है हमारी मानवता
यहां भी झुंड बनाकर रहते हैं हमेशा
मैं भी इसी झुंड का हिस्सा बनना चाहता हूं...
                                                     प्रशांत देशपांडे

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

डॉ. देवेश ठाकुर जी के उपन्यास का परिचय



डॉ. देवेश ठाकुर हिंदी के चर्चित साहित्यकार है| कुछ वर्ष पहले उनके ‘गुरुकुल’ और ‘शिखर पुरुष’ उपन्यास पढ़े थे| जिसमें उन्होंने शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी थी| विश्वविद्यालय स्तर पर प्राध्यापकों की चुनाव प्रक्रिया में हो रही राजनीति, शोधकार्य में चल रही धांधली, प्राध्यापकों में बढ़ रही गुटबन्दी एवं मूल्यहीनता को बहुत सशक्त रूप में पाठकों के सामने रखा था| अभी उनका ‘जंगल के जुगनू’ उपन्यास पढ़ा| सन् 2004 में प्रकाशित इस उपन्यास में उन्होंने समसामयिक समस्याओं पर विचार-विमर्श किया है| उपन्यास आत्मकथात्मक शैली में लिखा है| उपन्यास की केन्द्रीय पात्र डॉ. पलक महाविद्यालय में प्राध्यापक है| विवाह के कुछ ही वर्ष बाद उनके पति शुभम का देहान्त हो जाता है| विधवा पलक को अकेलेपन का जीवन जीना पड़ता है| उपन्यास के प्रारम्भ में ही हमेशा अपने अतीत में खोई हुई पलक हमारे सामने आती है| अपनी आपबीती पाठकों को बताती हुई वर्तमान में लौट आती है| डॉ. पलक की पारिवारिक समस्याओं को बहुत यथार्थ रूप में लेखक ने चित्रित किया है| एक प्राध्यापक और आत्मनिर्भर स्री होने के बावजूद विधवा होने का एहसास उसको अपने ही परिवार में होता है| परिवार में माँ और पिताजी के झगड़े जिसके कारण माँ-पिता का अलग रहना, माँ का पलक के प्रति दुर्व्यवहार, बहनों की स्वार्थी प्रवृत्ति, इन सबके बीच पलक का अपने दोनों बच्चों को संभालना, विधवा होने के कारण पलक के प्रति समाज की दृष्टी आदि को बहुत विस्तार के साथ लेखक ने चित्रित किया है|  
उपन्यास में डॉ. देवांगी भी महत्वपूर्ण पात्र है| डॉ. देवांगी भी प्राध्यापक है और उसकी भी ऐसी ही कहानी है| डॉ. पलक के समान वह भी अपनी योग्यता के बल पर सफलता प्राप्त करके आत्मनिर्भर बनी स्री है| उसकी शादी शहर के सम्मानित व्यक्ति सूरजभान के बेटे अशोक से हुई थी| लेकिन अशोक देवांगी को धोका देता है| उसकी विदेश में पहले से ही शादी हुई थी| उसके लिए देवांगी केवल एक वस्तु थी| जब यह सब सामने आता है तो सूरजभान देवांगी का साथ देकर अशोक को घर से निकाल देते है साथ ही बेदखल कर देते है| देवांगी मानसिक संघर्ष करते हुए भी अपने बच्चे को जन्म देने का निर्णय लेती है| डॉ. देवांगी को भी अकेलेपन का जीवन जीना पड़ता है|
डॉ. पलक और डॉ. देवांगी सभी सुविधाएँ होने के बावजूद भी अकेलेपन का जीवन जीने के लिए अभिशप्त है| डॉ. देवांगी ‘सहयोग’ नामक संस्था स्थापित करती है| जो कांदिवली के पास गाँधीनगर स्लम एरिया की झोपड़पट्टियों में रहनेवाले लोगों के विकास के लिए कार्य करती है| डॉ. देवांगी लोगों के सहयोग से संस्था के द्वारा से वहाँ रहनेवाले गरीब बच्चों के लिए स्कूल शुरू करना चाहती है| डॉ. देवांगी निस्वार्थ भाव से अपना सारा जीवन गरीब लोगों के लिए समर्पित करती है| लेखक ने यहाँ समाजसुधार का ढिंढोरा पीटनेवाली महिलाओं के सामने डॉ. देवांगी के रूप में आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया है| डॉ. देवांगी को ब्लड कैंसर होता है और उसकी मृत्यु हो जाती है| डॉ. देवांगी के बाद उसका समाजसेवा का व्रत लेकर डॉ. पलक डॉ. देवांगी के ही कदम पर आगे बढ़कर सहयोग संस्था का कार्य करती है| समाजसेवा का काम करते समय डॉ. पलक को भी अच्छे-बुरे अनुभवों से गुजरना पड़ता है| अपनी छात्राओं को साथ लेकर वह स्कूल बनाने का डॉ. देवांगी का सपना पूरा करने के लिए काम शुरू करती है| इस सामाजिक कार्य से जुड़कर वह अपना अकेलापन तो भूल ही जाती है साथ ही एक सार्थक जीवन जीने का उद्देश्य भी उसको मिल जाता है|
काम करते समय सहयोग के कार्यालय की अलमारी में डॉ. पलक को एक नोटबुक मिल जाती है जिसमें डॉ. देवांगी के जीवन के कई घटनाएं पलक को पता चलती है| डॉ. देवांगी का अन्तर्द्वन्द्व, डॉ. बिजॉय घोष के प्रति प्रेम, अलग होने के बाद भी अशोक का बार-बार परेशान करना और उसमें भी संघर्ष करती हुई आगे बढती हुई डॉ. देवांगी आदि उसके व्यक्तिगत जीवन के कई पक्ष सामने आते है|                   
उपन्यास में लेखक ने देश की वर्तमान समस्याओं पर गहराई के साथ चिंतन किया है| देश की  स्वतन्त्रता के बाद आज तक जितने सामाजिक विकास के सपने हमने देखे वे आज भी पुरे नहीं हुए है| जातिवाद, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, किसानों की समस्या आज भी महत्वपूर्ण है| लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि भूमंडलीकरण के बाद आर्थिक स्तर पर दूरियाँ और भी बढ़ी है| गरीब और गरीब होते जा रहे है| इसलिए सामाजिक - आर्थिक उन्नति का सपना तभी पूरा हो सकता है जब अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक हम पहुँचे और उसके उन्नति के लिए काम करे| इन तमाम समस्याओं को देखकर लगता है सब ओर अँधेरा ही छाया है| ऐसे अँधेरे में एक स्थाई रौशनी की आवश्यकता है जो अँधेरे को मिटा सके|  इसी अँधेरे को मिटाने की कोशिश जंगल के जुगनू की तरह डॉ. देवांगी और डॉ. पलक कर रही है| लेखक लिखते है “डॉ. पलक और देवांगी तो केवल जंगल के टिमटिम करते जुगनू है| जो जलते-बुझते रहते है|” डॉ पलक के सामाजिक कार्य के लिए उसको संकल्प प्रतिष्ठान की ओर से महाराष्ट्र मनीषा पुरस्कार दिया जाता है| क्योंकि वह भी देवांगी के समान जुगनू ही तो है जो इस अँधेरे को मिटाने के लिए अपना योगदान दे रही है|    
डॉ. देवांगी ने भी अपने नोटबुक में एक कविता भी लिखी थी

हम सूरज की ज्योति नहीं है
हम उजियाले के स्रोत नहीं है
हम तो जंगल के जुगनू हैं|

अंधियारे की पगडंडी पर
बिखरे बेहार सवाल
धुंध ने लील लिए सब
बासंती सपने, बेहाल

चेहरों पर शाम पुती-पुती है
हर नजर यहाँ झुकी-झुकी है
और प्रकाश की किश्तियाँ
न जाने कहाँ रुकी-रुकी है|

सूरज लाए कौन यहाँ
चंदा लाए कौन यहाँ
हम तो टिमटिम करते
जंगल के जुगनू हैं|
                                             प्रशांत देशपांडे    

बुधवार, 4 मार्च 2020

भूमंडलीकरण के युग में बापू के किसान


भूमंडलीकरण के युग में बापू के किसान

भारतीय समाज एवं राजनीति को गाँधीजी के विचारों ने हमेशा प्रभावित किया है| गाँधीजी ने जिन विभिन्न क्षेत्रों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया उसमें कृषि क्षेत्र एवं किसान महत्वपूर्ण रहे हैं| उन्होंने देश के आर्थिक विकास में किसानों की सहभागिता को महत्वपूर्ण माना| गाँधीवादी अर्थव्यवस्था का लक्ष्य किसानों को ही आत्मनिर्भर बनाना था| किसानों के संदर्भ में गाँधीजी के निजी आदर्शवादी विचारों की चर्चा करने से अधिक महत्वपूर्ण है उनकी किसानों के प्रति राजनीतिक दृष्टि पर विचार-विमर्श हो|
स्वतन्त्रता के पूर्व देश में जमींदारी प्रथा अस्तित्व में थी| एक तरफ जमींदारों के शोषण से त्रस्त होकर उनके खिलाफ कई जगहों पर किसान आन्दोलन भी चल रहे थे तो दूसरी ओर अंग्रेजों के साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ राष्ट्रीय आन्दोलन भी चरम पर था| गाँधीजी और कांग्रेस की नजर में प्रधान मुद्दा साम्राज्यवाद से संघर्ष था इसलिए जमींदारों के खिलाफ चल रहे किसान आन्दोलनों के प्रति उनकी सकारात्मक दृष्टि नहीं थी| किसानों के प्रश्नों को स्थानीय मानकर उसकी उपेक्षा की गई| यह स्वीकार करना होगा कि जहाँ किसान संघर्ष सीधा अंग्रेजों के खिलाफ है वहाँ गाँधीजी ने नेतृत्व किया| जिसमें सन 1917 में बिहार का चम्पारण सत्याग्रह और सन 1918 का गुजरात का खेड़ा सत्याग्रह महत्वपूर्ण है| अपनी राजनीतिक स्वार्थ के लिए गाँधीजी और कांग्रेस कभी भी किसानों पर अन्याय करनेवाले जमींदारो, तालुकेदारों, साहूकारों और देशी रियासतों के विरुद्ध आवाज नहीं उठाई| ट्रष्टीशिप नामक अपने आदर्श एवं अव्यावहारिक सिद्धांतों की आड़ में जमींदारों के हितों की रक्षा की|       
सन 1916 में गाँधीजी ने कहा था कि “हमें किसान ही मुक्ति दिला सकते हैं वकीलों, डॉक्टरों या धनी जमींदारों के बूते की बात नहीं है|”
सन 1922 की बारदोली की कांग्रेस वर्किंग कमिटी में जमींदारों को आश्वस्त किया कि कांग्रेस की मंशा उनके क़ानूनी अधिकारों पर चोट करने की कतई नहीं हैं| बैठक में घोषणा की गई कि रैयतों द्वारा लगान अदा न करना कांग्रेस के प्रस्ताव के विपरीत और देशहित के लिए घातक है|
असहयोग आन्दोलन के समय देशी रियासत के विरुद्ध चले तीखे किसान आन्दोलन की गाँधीजी ने निंदा की क्योंकि किसान आन्दोलन में हिंसा को महत्व मिलता था| लेकिन उस समय किसी भी अहिंसा के चश्मे पहने हुए व्यक्ति को जमींदारों के द्वारा किसानों का शोषण दिखाई नहीं दे रहा था|   
अवध किसान आन्दोलन के साथ बाबा रामचन्द्र की नजरबंदी कांग्रेसी नेताओं की चालबाजी थी| वे किसान आन्दोलन को अपने काबू में रखना चाहते थे| सन 1937 में बिहार में कांग्रेस ने किसान सभा के सहयोग से चुनाव जीता| साम्राज्यवाद से समझौता करके औपनिवेशिक स्वराज्य स्थापित किया| कांग्रेसी सत्ता ने किसानों का हिंसक दमन किया| सहजानंद जैसे किसान नेताओं को जेल में डाला|
इस युग के महत्वपूर्ण लेखक मुंशी प्रेमचन्द ने सन 1936 में ‘गोदान’ उपन्यास का सृजन करके किसानों की समस्या को केंद्र में रखा| प्रेमचन्द गाँधीवादी विचारों से प्रभावित थे अत: उन्होंने अपने उपन्यासों में समस्याओं के आदर्शवादी समाधान प्रस्तुत किए| आरम्भ में मार्क्सवादी दर्शन पर निर्मित समाज व्यवस्था का स्पष्ट स्वरूप प्रेमचंद के सामने नहीं था| इसलिए वे गाँधी जी विचारों के आधारपर ही तत्कालीन समस्याओं का समाधान खोज रहे थे| ‘गोदान’ उपन्यास में किसानों की समस्या का कोई समाधान प्रस्तुत नहीं किया है| उपन्यास का केन्द्रीय पात्र होरी का जमींदारों द्वारा शोषण, उसका अपने मृत्यु तक संघर्ष का चित्रण करके प्रेमचन्द ने किसानों का अन्तरंग यथार्थ ही प्रस्तुत किया है|  
स्वतन्त्रता के बाद भूमि सुधार के लिए कदम उठाए गए| जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ| सरकारों के सामने मुख्य लक्ष्य खाद्यान्नों की खपत के अनुरूप उपज बढ़ाना था| हरित क्रान्ति हुई| रासायनिक खाद और कृषि संबंधित उद्योगों पर जोर दिया| लेकिन किसानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य के संदर्भ में कभी गंभीरता से नहीं सोचा गया| इसलिए किसानों की स्थिति में बहुत सकारात्मक बदलाव नहीं हुए| अर्थात इसके पीछे प्राकृतिक आपदाएँ भी महत्वपूर्ण कारण रही है| 
सन् 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुजर रही थी| सरकारी खजाना खाली हो रहा था| उस समय प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव तथा वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों के लिए भूमंडलीकरण को स्वीकारा| भारत में आर्थिक सुधारों का नया दौर प्रारंभ हुआ| तत्कालीन भारत की आर्थिक स्थिति पर गंभीरता से सोचे तो यह निर्णय अभूतपूर्व था| इन बदली हुई स्थितियों के कारण दुनिया लोगों के लिए छोटी होने लगी| एक देश का पूँजिपति दूसरे देश में अपनी पूँजी का निवेश करने लगा| भारत जैसे विकासशील देश दुनिया के पूँजीपतियों के लिए एक बाजार के रूप में उपलब्ध हो रहे थे| भूमंडलीकरण की नीतियों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ सकारात्मक परिणाम हुए| भारत में जीडीपी अर्थात सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 1991-92 में 1.3 प्रतिशत था वही 2005-06 का 8.4 प्रतिशत हो गया| विदेशी मुद्रा के भंडार में तथा वृद्धि हुई| भारतीय स्टॉक एक्सचेंज में बदलाव हुआ| मध्यवर्ग का विकास हुआ| एक नए भारत का उदय हुआ| ऐसा सब होते हुए भी कई ऐसे पहलू हैं जहाँ भूमंडलीकरण की नीतियों  सफल नहीं हो सकी| जिसमें सबसे महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्र था| भूमंडलीकरण के बाद कृषि सरकार की प्राथमिकता का विषय नहीं रहा| अर्थव्यवस्था में कृषि का अंश घटता चला गया| भूमंडलीकरण की विकास प्रक्रिया में सेवा और उद्योग क्षेत्र के ही विकास पर बल दिया गया| भारत की कृषि अर्थव्यवस्था पर भूमंडलीकरण का नकारात्मक प्रभाव हुआ|
सरकार की विभिन्न योजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण प्रारंभ हुआ| विस्थापन एक महत्वपूर्ण समस्या बन गई| विदेशी कम्पनियों को बड़ी-बड़ी योजनाओं का ठेका मिलने लगा और यहाँ का किसान विस्थापित होकर समस्याओं की खाई में डूबने लगा| बाँध, बिजली, खदान जैसी योजनाओं के कारण गाँव के गाँव विस्थापित होने लगे| कृषि संस्कृति नष्ट हुई| गरीब किसानों की जमीन कम कीमत पर पूँजीवादी वर्ग ने खरीदी और वहाँ पर होटेल, रेस्टॉरंट तथा विभिन्न पर्यटन स्थल बने| विदेशी निवेश के लिए सरकार ने सन् 2000 में विशेष आर्थिक क्षेत्र अर्थात ‘सेज’ नामक योजना शुरू की| जिसके माध्यम से किसानों की भूमि अधिग्रहित होना शुरू हुआ| सेज में पश्चिम बंगाल में सिंगुर और महाराष्ट्र के पेन, रायगढ़ के उदाहरण ले सकते है| 
भूमंडलीकरण ने मुक्त अर्थव्यवस्था और खुला बाजारवाद का समर्थन किया जिसमें बैंक और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का विकास हुआ लेकिन इस विकास की अंधी दौड़ में किसानों की विनाश प्रक्रिया प्रारंभ हुई| किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हुए| वर्ष 1998 से 2005 तक 9000 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है| पंजाब, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे क्षेत्रों में हमेशा किसानों के आत्महत्याओं की खबरे आती रहती है| संजीव ने ‘फाँस’ उपन्यास किसान आत्महत्याओं को केंद्र में रखकर ही लिखा है जो महाराष्ट्र के विदर्भ की पृष्ठभूमि पर आधारित है| उनका मानना है कि भूमंडलीकृत व्यवस्था में किसानों को नये बीज, खाद, कीटकनाशक मिले जिसके कारण बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का फायदा हुआ| विकास के इस मॉडल ने किसानों को बर्बाद किया| संजीव ‘फाँस’ उपन्यास में लिखते है- “विदेशी बीज, विदेशी कर्ज, विदेशी गाय, विदेशी नीति और यहाँ का सूखा किसान और सूखी धरती|” पृ.क्र.69 फाँस संजीव नकदी फसल को पूँजीवाद-साम्राज्यवादी शक्तियों के द्वारा फैलाया लोभ का जहर मानते हैं| किसानों की आत्महत्या का कारण वे किसी महामारी या विपत्ति नहीं मानते| वे स्पष्ट करते है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में किसानों को हाशिए पर धकेला जा रहा है| संजीव उपन्यास में यथार्थ स्थितियों पर प्रकाश डालते हुए लिखते हैं- “यह भी बताया जाता है की चीन और अमेरिका में हायब्रेडों की जगह देशी साधारण प्रजातियों पर जोर दिया जा रहा है| मोसेंटो का प्रचार है कि हमारे किसानों का 40,000 करोड़ का लाभ हो रहा है| सच्चाई इसके उलट थी| हजारो करोड़ों का फायदा इन कंपनियों को और इसके दलालों को हो रहा था| किसान तो मर रहे थे|” पृ.क्र.फाँस 199 संजीव के अनुसार हमारे नीति निर्माता अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के दलाल बनते जा रहे है| ‘फाँस’ उपन्यास में भूमंडलीकरण पर प्रकाश डालते हुए सुभद्रा कुमारी सिन्हा ने लिखा है - “फाँस कॅारपोरेट समय की वह कथा है जो जितनी गहराई से उसके छल-छद्मों और उसके विद्रूपों पर रोशनी डालती है उतनी ही मार्मिकता से उन छोटे छोटे सवालों पर भी प्रश्न चिन्ह लगाती है जिन्हें भूमंडलीकरण का चक्का कुचल रहा है| विकास के तमाम दावों को झुठलाता यह उपन्यास भूमंडलीकरण से उत्पन्न उदारीकरण की आर्थिक नीतियाँ किस प्रकार किसानों का अहित कर रही है इसका पर्दाफाश करती है|” जनवरी-मार्च 2018 लमही पृ.क्र. 105 संपा विजय राय
भूमंडलीकरण ने उदारीकरण और निजीकरण को बढ़ावा दिया इसलिए ग्रामीण भागों में जमीन की कीमत बढ़ी| उद्योजकों ने ग्रामीण जनता को रुपयों का लालच दिखाकर जमीन खरीदना शुरू किया| भूमंडलीकरण के कारण शहरों का विकास तेज़ी से हुआ| ग्रामीण भागों में शहरों का आकर्षण बढ़ा| जमीन की कीमत बढ़ने के कारण ग्रामीण लोग अपनी जमीन बेचकर शहरों में रहने के लिए जाने लगे| रोजगार के अवसर भी प्राप्त होने लगे लेकिन इससे कृषि योग्य जमीने नॉन एग्रीकल्चर करके वहाँ प्लाट बिल्डिंग बनने लगी| भूमंडलीकरण ने उपभोक्ता संस्कृति को जन्म दिया| भौतिक उन्नति को ही विकास का मानदंड माना जिसके कारण कृषि क्षेत्र के उन्नति की ओर ध्यान केन्द्रित नहीं हुआ| बिल्डरों ने गाँव की कृषि योग्य जमीन खरीदकर वहाँ बिल्डिंग और बंगले बनाना शुरू किया| इस एकांगी विकास पर ‘फाँस’ उपन्यास का पात्र नाना कहता है- “बालू, मिट्टी ईट या खाद की ढुलाई| सडकों के किनारे सारी खेती वाली जमीने बिक चुकी है| मकान बन रहे है| आनेवाले दिनों में सिर्फ बिल्डिंगे होगी; चमचमाती सड़के होगी और चमचमाती गाड़ियाँ| न हमारे जैसे लोग होंगे न खेती, न हमारी तुम्हारी बैल गाड़ियाँ|” पृ.क्र.36 फाँस
संजीव के समान ही भूमंडलीकरण के कृषि जीवन पर हुए नकारात्मक प्रभाव को राजू शर्मा ने भी अपने ‘हलफनामे’ उपन्यास में दिखाया है| उपन्यास किसान आत्महत्या को केंद्र में रखकर लिखा गया है| उपन्यास में किसान आत्महत्या के आर्थिक एवं सामाजिक कारणों की तलाश की गई है| उपन्यास में माथाफेर मिश्र माकपा का प्रत्याशी है| वह मकई को कहता है- “असल में सरकार मूलत: किसान और कृषि विरोधी है| वह कृषि सेक्टर को गरीब किसान के हाथ से छीनकर पूँजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सौंपना चाहती है|” हलफनामे पृ.क्र. 219
कृषि क्षेत्र में जी.एम. फसलों का इस्तेमाल हमेशा विवाद का विषय रहा है| जी.एम. फसल अर्थात जेनेटिकली मोडीफाइड इसे हिंदी में जैविक रूप से कृत्रिम तरीके से बनाई गई फसल बीज कहते है| इसका एक आर्थिक पहलू है| जी.एम. फसलों के उत्पादन में अमेरिका का बहुत बड़ा हिस्सा रहा है| इसलिए अमेरिका चाहता रहा है कि वैश्विक बाजार में जी.एम. को लेकर स्वीकार्यता बढ़े| भारत में सन् 2002 में पचपन हजार किसानों ने आत्महत्या की जिन्होंने जी.एम. कपास उगाई थी| इस स्थिति की ओर संकेत करते हुए ‘हलफनामे’ उपन्यास के पात्र सुदर्शन के माध्यम से लेखक कहते है कि- “कई प्रदेशों में नई तरह की जी.एम. कपास की खेती हो रही है जिसपर काफी विवाद है क्योंकि कुछ विशेषज्ञों ने कहा कि इस तब्दीली से हजारों किसान बरबादी के कगार पर पहुँच गए हैं|” हलफनामे पृ.क्र.175
भूमंडलीकरण में मुक्त बाजार को स्वीकृति मिली| स्वभाविक रूप से अर्थ का महत्व बढ़ा| दलाली संस्कृति सशक्त रूप में सामने आई| माँल संस्कृति के कारण किसानों का ही उत्पादन कम दामों में लेकर दुगने दामों में बेचना शुरू हुआ| विदेशों से बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति हुई इसलिए किसानों की मेहनत का मूल्य नहीं रहा| खुला बाजार के कारण विदेशों से उत्पादन वस्तुओं को आयात किया गया| मुक्त अर्थव्यवस्था से विकास की प्रक्रिया भले प्रारंभ हो लेकिन कृषि जीवन पर नकारात्मक परिणाम हुए| खुले बाजार की नीति के कारण विदेशी उत्पादन देश में आने लगा इसलिए यहाँ उत्पादित उत्पादनों की कीमत घटी जिसका प्रभाव कृषि जीवन पर हुआ| उपन्यास में सुदर्शन मकई को कहता है- “इस गाँव में इलायची की खेती होती है| दो बरस से बाजार में इलायची के दाम पाँच गुने गिर गये थे| बाहर के देशों से सस्ती, बिना खुशबूवाली इलायची आयात हो रही थी जो स्वाद के लिए थोडी सी देशी इलायची मिलाकर धडल्ले से बिक रही थी, निर्यात हो रही थी| सुरक्षा का कोई तरीका नहीं था| पूरा व्यवसाय बिगड़ गया था| नुकसान ही नुकसान| कर्ज चढ़ गया था| पर क्या करें ? अंतरराष्ट्रीय बाजार के तिलिस्म में किससे गुहार करें?” हलफनामे पृ.क्र. 180 राजू शर्मा ने इस उपन्यास में आंध्रप्रदेश में किसानों की आत्महत्या का कारण सन् 1997-98 के बाद कपास के दाम गिरना ही माना है|

कमलाकांत त्रिपाठी के ‘बेदखल’ उपन्यास का किसान सूचित गाँधी के युग का किसान है वह कहता है “ऐसा क्यों होता है ? एक लहर उठती है और लगता है सब कुछ बदल जाएगा, हमारी जिन्दगी सुधर जाएगी| लेकिन होते-होते सब बिखर जाता है| फिर ढ़ाक के तीन पात| लेकिन हम आस लगाए बैठे रहते हैं| फिर से लहर उठेगी| फिर से तूफ़ान आएगा| ऐसे एक के बाद एक जिंदगियाँ बीतती चली जाती हैं|” पृष्ठ क्र. 201 बेदखल   

सम्पर्क : प्रशांत देशपांडे
व्याख्याता, श्रीमती मणिबेन एम्.पी. शाह विमेंस कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स एंड कॉमर्स, माटुंगा (पूर्व)
मोबाईल नं 9076089071

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