विज्ञान कथा लेखन में महिलाओं का योगदान
आज का युग विज्ञान का युग है| वर्तमान में प्रत्येक क्षेत्र विज्ञान से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हैं| प्राचीन समय से ही मानवीय प्रवृत्ति जिज्ञासु एवं नवनिर्माण की रही है| विभिन्न आविष्कारों से मानव जीवन का भौतिक विकास हुआ| समय के साथ-साथ मनुष्य की वैज्ञानिक दृष्टि भी विकसित होती रही है| जो कल्पनाएँ एक समय में असंभव प्रतीत होती थी वह यथार्थ में साकार हो रही है| एक बात निर्विवाद रूप से स्पष्ट है कि वैज्ञानिक विकास के केंद्र में मनुष्य जीवन ही है| कोई भी वैज्ञानिक आविष्कार मानव जीवन को सुखकर बनाने के लिए ही किया जाता है| वैज्ञानिक सिद्धांत जितने जटिल होते है उतने ही सामान्य पाठक के लिए नीरस प्रतीत होने की सम्भावना रहती है| इसलिए इस वैज्ञानिक दृष्टी को एवं तथ्यों को रोचकता एवं कलात्मकता के साथ अभिव्यक्त किया जाता है तो सामान्य पाठकों के मन में गहन एवं गंभीर विषयों के प्रति रूचि निर्माण होती है| इसी को केंद्र में रखकर विज्ञान कथा सृजन का प्रारम्भ हुआ होगा| विज्ञान कथा लेखन बड़े पैमाने में नहीं हुआ क्योंकि विज्ञान कथा लिखने के लिए लेखक के पास वैज्ञानिक सिद्धांतों की जानकारी होनी आवश्यक है या लेखक की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि होनी चाहिए| इस बात को स्पष्ट करते हुए मनोहर श्याम जोशी ने लिखा है -“हिंदी में अब तक विज्ञान कथा लेखन का क्षेत्र लगभग अछुता ही रहा है| शायद इसलिए कि यह काम आसान नहीं| उत्कृष्ट विज्ञान कथाओं के सृजन के लिए यह जरूरी है कि विज्ञान के आधुनिकतम आविष्कारों,उनकी संभावनाओं और दायित्व बोध से भलीभांति परिचित होने के साथ ही लेखक रोचक और बोधगम्य शैली का भी धनी हो|”1 विज्ञान कथाकार का प्रतिपाद्य विज्ञान को सामान्य लोगों तक पहुँचाना है| लेखक को मर्यादाओं में रहकर ही काल्पनिक संसार खड़ा करना होता है| लेखक को उन्हीं बातों का जिक्र करना पड़ेगा जिसमें भविष्य में सम्भव होने के चिह्न प्रतीत हो|
बाल फोंडके ने ‘बीता हुआ भविष्य’ नाम से विज्ञान कथाओं का संकलन किया जिसकी भूमिका में उन्होंने लिखा है – “भारत में किसी भी भाषा में लिखी जा रही विज्ञान कथाओं की मूल विषय-वस्तु प्रमुखतया मानव केन्द्रित है जो वैज्ञानिक प्रगति तथा मानवीय संवेदनाओ अथवा सामाजिक सिद्धान्तों के पारस्परिक प्रभाव को दर्शाती है|”2 हिंदी में कहानी विधा में बहुत लेखन हुआ है| विज्ञान कहानी और साहित्यिक-सामाजिक कहानी में अंतर बताते हुए विज्ञान कथा लेखक डॉ.अरविन्द मिश्र के कहते है -“विज्ञान कथा साहित्यिक कहानियों की तरह ही कहानी की एक विधा है जिसमें आनेवाले कल की तसवीरें देखने को मिलती हैं जबकि सामाजिक कहानियों में अतीत या वर्तमान की झलक देखने को मिलती है|”3 मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि जो कथा विज्ञान को केंद्र में रखकर लिखी जाती है वही विज्ञान कथा है|
हिंदी में समृद्ध ना सही लेकिन विज्ञान कथा लेखन की परम्परा दृष्टिगोचर होती है| आधुनिक कथा साहित्य के अंतर्गत प्रारम्भ में जब तिलस्मी-जासूसी कथा साहित्य का सृजन हो रहा था उस समय से ही विज्ञान कथा लेखन प्राप्त होता है| अम्बिका दत्त व्यास द्वारा रचित ‘आश्चर्य वृत्तान्त’ विज्ञान कथा है जिसका प्रकाशन धारावाहिक रूप से ‘पीयूष प्रवाह’ पत्रिका में सन 1884-1888 में हुआ| उसके बाद सन 1900 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में बाबू केशव प्रसाद सिंह की विज्ञान कथा ‘चन्द्रलोक की यात्रा’ प्रकाशित हुई| सन 1908 में सत्यदेव परिव्राजक ने सरस्वती पत्रिका में ‘आश्चर्यजनक घंटी’ नामक विज्ञान कथा लिखी जो ध्वनि के अनुनाद के सिद्धांत पर आधारित है| सन 1915 में ‘विज्ञान’ नामक पत्रिका का प्रारंभ हुआ| प्रेम वल्लभ जोशी ने ‘छाया पुरुष’ (1915) प्रकाश के अपवर्तन पर कहानी लिखी| अनादिधन बंद्योपाध्याय ने 1915-16 में मंगल यात्रा का वृत्तान्त लिखा| देवकीनंदन खत्री के पुत्र दुर्गाप्रसाद खत्री ने ‘स्वर्गपुरी’ नामक रचना लिखी जिसमें उन्होंने स्टीलमैन(रोबोट) की परिकल्पना की जो आज सम्भव हो रही है| डॉ.सम्पूर्णानन्द ने ‘पृथ्वी से सप्तर्षि मंडल’(1953) लम्बी विज्ञान कथा लिखी जिसे लघु उपन्यास भी कहा जा सकता है| डॉ.नवलबिहारी मिश्र ने अधूरा अविष्कार (1960),सत्य और मिथ्या (1963) दो विज्ञान कथाओं के संग्रह के माध्यम से विज्ञान कथा लेखन को नई दिशा प्रदान की| डॉ.ओमप्रकाश शर्मा ने भारतीय पुराण कथाओं में विज्ञान की तलाश की| पुराणों में विज्ञान कथाओं के बीज खोजने का प्रयास किया| मंगल यात्रा,जीवन और मानव उनकी महत्वपूर्ण रचनाएँ है| उनकी ‘शिशु उत्पादन कारखाना’ नामक कहानी चर्चित है| राम लखन सिंह ने वैज्ञानिक की सनक (1966),मौत एक पेड़ पर(1970) कहानियों का सृजन किया| रमेश वर्मा की चन्द्रलोक की यात्रा,झिलमिलाते सितारे,हमारा पड़ोसी चाँद,अन्तरिक्ष की खोज आदि कहानियाँ महत्वपूर्ण हैं| कैलास साह का मृत्युंजय(1976)विज्ञान कथाओं का संग्रह तथा मायाप्रसाद त्रिपाठी के आकाश की जोड़ी(1971),साढ़े सात फुट की तीन औरते(1971) कथा संग्रह भी विज्ञान साहित्य में काफी प्रशंसनीय है|
1960-70 के दशक में विज्ञान कथा लेखन के लिए पर्याप्त वातावरण बना था| काफी लोग विज्ञान कथा लेखन में सक्रिय हुए| देवेन्द्र मेवाड़ी का नाम महत्वपूर्ण है जिन्होंने ‘किसान भारती’ नामक कृषि मासिक पत्रिका का सम्पादन कार्य किया| पशुओं की प्यारी दुनिया,हार्मोन और हम,फसले कहे कहानी आदि उनकी रचनाएँ है| मेवाड़ीजी के भविष्य(1994) और कोख(1998) कहानी संग्रह महत्वपूर्ण है| अरविन्द मिश्र ने गुरु दक्षिणा(1985)रचना लिखी| उनका ‘एक और क्रोंचवध’(1998) कहानी संग्रह है जिसमें बारह कहानियाँ संग्रहित है| डॉ.राजीव रंजन उपाध्याय का विज्ञान कथाओं का संग्रह ‘आधुनिक विज्ञान कथाएँ’ (1994) महत्वपूर्ण है जिसमें सोलह कहानियाँ संकलित है|
इनके अतिरिक्त विज्ञान कथा लेखन में शुकदेव प्रसाद,जाकिर अली रजनीश,हरीश गोयल,जीशान हैदर जैदी.मनीष गोरे,अमितकुमार आदि लेखकों का महत्वपूर्ण योगदान हैं|
विज्ञान कथा साहित्य लेखन परम्परा में महिला लेखिकाओं ने विज्ञान कथाओं का सृजन करके अपनी वैज्ञानिक दृष्टि का परिचय दिया है जिसमें मृदुला गर्ग,कल्पना कुलश्रेष्ठ,निर्मला भुराड़िया,विनीता,सिंघल,अर्चना शर्मा,डॉ.शशि सिंह आदि महत्वपूर्ण है| मृदुला गर्ग की कहानी ‘कालिदास का विद्रोही मेघ’ सारिका पत्रिका में अप्रैल 1985 में छपी थी जो भोपाल गैस त्रासदी पर आधारित है| कहानी पर्यावरणीय विभीषिकाओं से हमें सचेत करती है| मध्यप्रदेश के भोपाल शहर में 3 दिसम्बर 1984 को भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई| भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी के कारखाने से एक जहरीली गैस का रिसाव हुआ जिससे लगभग पन्द्रह हजार से अधिक लोगों की जन गई तथा बहुतांश लोग अनेक तरह की शारीरिक अपंगता से लेकर अंधेपन के भी शिकार हुए| वह रासायनिक कीटकनाशक उत्पादन का कारखाना था| भोपाल गैस त्रासदी मानव इतिहास की एक ऐसी औद्योगिक त्रासदी है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता| इस दुर्घटना को पृष्टभूमि बनाकर मृदुला गर्ग ने वैज्ञानिक औद्योगिक विकास और उसके परिणामस्वरूप निर्माण हो रही पर्यावरणीय समस्याओं को उठाया हैं| कालिदास ने अपनी प्रेयसी को संदेश भेजने के लिए मेघ को अपना दूत बनाया था| लेखिका कहती है कालिदास आज जीवित होते तो उनका मेघ जहर के बादल के बीच बिला गया होता| लेखिका कल्पना करती है कि “यह भी हो सकता था कि मेघ खुद कह उठता उनसे बहुत हुआ,अब और सहायता मैं मनुष्य की नहीं कर सकता|क्यों युद्ध छेड़ रखा है उसने प्रकृति से? प्रकृति ने बहुत सहा बहुत चेताया,पर मानव नहीं चेता|बहुत हुआ कवि अब प्रकृति को अपने बचाव के लिए हिंसा करनी होगी|मेरा दर्द तुम यदि समझ नहीं सकते,मेरी मजबूरी से द्रवित नहीं हो पाते तो कैसे कवि हो? जानते हो,अब मेरा बहाव निर्मल नहीं,अबाध नहीं|पथ अवरुद्ध है,मैला है,रुका कटा ,बोझ तले घुटा है|अपनी दिशा तलाशने के लिए मुझे लड़ना पड़ता है|पल-पल दूषित होना पड़ता है|रोज-रोज जहरीले कण पीने के बजाय एक बार ही समूचा जहर निगल जाऊंगा और बरसा दूंगा मनुष्य जाति पर|”4 देश स्वतंत्रता के बाद औद्योगिक विकास को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया जिसपर टिप्पणी करते हुए लेखिका कहती है “विकास को रोक तो नहीं सकते औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण हमारी नीतियाँ है और उनकी राह पर चलना अपनी कीमत मांगता है|यानी अभी और बहुत लोग मरेंगे और अधिक पंगु होंगे| जहर उगलते कारखानों में रोजगार पाये मजदूरों के बच्चे भरपेट मरेंगे|”5 लेखिका स्पष्ट करती है कि देश में राजतन्त्र और उद्योगतन्त्र का गठबंधन है जिसको सामान्य मनुष्य तोड़ नहीं सकता| जो सत्ता में है उनके घर कारखानों से दूर होते है| कहानी के उत्तरार्ध में मेघ का कहना है कि वह अब कभी नहीं बरसेगा और हवा भी प्रदुषण के कारण उपर ही कैद रहेगी| मेघ कहता है “सूरज अब कभी नहीं निकलेगा जब-जब कारखाने जहर उगलेंगे,सर्द हवा उसे नीचे खींचे रहेगी|धूप होगी नहीं तो जहर का धुआं भाप बनकर ऊपर कैसे उठेगा,यही बिछा रहेगा तुम्हारे सिरों के ऊपर और धंसता जायेगा लगातार तुम्हारे फेफड़ों के अंदर|6 लेखिका संकेत करती है कि हमें वैज्ञानिक औद्योगिक विकास के साथ प्राकृतिक संसाधनों के बारे में भी गम्भीरता से सोचना होगा|
कल्पना कुलश्रेष्ठ की कहानी ‘अपराधी’ विज्ञान प्रगति पत्रिका में अगस्त,1997 में छपी थी जिसमें उन्होंने भविष्य में मानव के अमरत्व का काल्पनिक संसार गढ़ा है| मानव जीवन प्रकृति प्रदत्त है| वैज्ञानिक प्रयोगों की मर्यादाएँ प्रकृति के सामने हमेशा स्पष्ट हुई है और भविष्य में भी स्पष्ट होती रहेगी| कहानी का समय सन 2120 है|शैलेश और शुभदा दोनों पति-पत्नी है| वे एक दूसरे से बेहद प्रेम करते है साथ ही एक दूसरे के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित है| विवाह के छे वर्ष के बाद भी शैलेश के मन में शुभदा के प्रति आकर्षण है| एक दिन दोनों भी हादसे में घायल हो जाते है| दोनों को अस्पताल में पहुँचाया जाता है| अस्पताल में शैलेश को मिलने के लिए उसके बड़े भाई श्रीधर आते है जो अमेरिका में शोधकार्य कर रहे है| शैलेश तो ठीक हो जाता है| वो श्रीधर से शुभदा के बारे में जानना चाहता है| शैलेश का शुभदा के प्रति प्रेम श्रीधर जानता है इसलिए आगे का इलाज करने के लिए वह शुभदा को अपने साथ अमेरिका लेकर जाता है| तीन माह बाद अपना वादा पूरा करके श्रीधर शुभदा को शैलेश के पास भेज देता है| दोनों ने मृत्यु को इतना नजदीक से देखा था लेकिन बाद में वैवाहिक जीवन शुरू हो जाता है| अचानक श्रीधर को पता चलता है कि शैलेश ने अपनी पत्नी शुभदा की हत्या की और जेल चला गया है| श्रीधर भारत आता है और तुरन्त जेल में शैलेश को मिलने जाता है| शैलेश श्रीधर को हत्या की वजह बताता है| दरअसल उस दुर्घटना के बाद शुभदा में अजीब सा परिवर्तन आ गया था| वह एक मूर्ति की तरह भावशून्य हो गई थी यंत्र की तरह संवेदनाहीन हो चुकी थी|शैलेश हमेशा भय में घिरा रहता था और एक दिन निराशा में उसको मार डालता है| जब शैलेश को न्यायालय के कटघरे में खड़ा किया जाया है तो श्रीधर शुभदा के बारे में सभी रहस्यों को खोलता है जो चौकानेवाले है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते| श्रीधर स्पष्ट करता है कि शुभदा की मृत्यु हादसे में ही हुई थी| वह न्यायालय के सामने स्पष्ट करता है उन्होंने कृत्रिम मस्तिष्क को शुभदा के मस्तिष्क के स्थान पर प्रत्यारोपित किया| न्यायालय में सन्नाटा छा जाता है| मानव जाति के इतिहास में यह अनोखी घटना थी| कहानी से स्पष्ट होता है कि प्रत्यारोपित कृत्रिम मस्तिष्क कभी भी प्राकृतिक मस्तिष्क का स्थान नहीं ले सकता| इसलिए उसके नकारात्मक पक्ष ही सामने आये| कहानी का अंतिम वाक्यांश कहानी के कथ्य को और भी स्पष्ट करते है “विज्ञान,प्रकृति और मानव तीनों कितने भी अन्तरंग हो इनके बीच सूक्ष्म सीमा रेखाएँ अवश्य है जो इन्हें अपनी-अपनी परिधि में रहने को विवश करती है| जहाँ यह सीमा रेखाएँ टूटी वहीं कोई जटिल गुत्थी सुरसा सां मुख फैलाये उठ खड़ी होती है सब कुछ निगलने को आतुर|”7
निर्मला भुराड़िया की कहानी ‘जिन्दगी श्रीधर सेवक की’ जनसत्ता 6 फ़रवरी 1994 में छपी थी| कहानी के केंद्र में यंत्रमानव अर्थात रोबोट है जिसकी चर्चा वैज्ञानिक विकास के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर हुई है| अभी कुछ दिन पहले ‘सोफिया’ रोबोट की चर्चा माध्यमों में बहुत हुई जिसको सऊदी अरब ने नागरिकता दी है| सोफिया की विशेषता है कि वह भाव भंगिमाएँ पहचान सकती है| कृत्रिम बुद्धिमत्ता को बढ़ावा देने के लिए सऊदी अरब ने रोबोट को नागरिकता दी| निर्मलाजी ने अपनी कहानी में रोबोट के सकारात्मक पक्ष सामने रखा है| कहानी में डॉ. सिन्हा अपने घरेलू एवं ऑफिस के कार्य करने के लिए श्रीधर नामक रोबोट को अपने घर रखते है|श्रीधर सब काम करता है| डॉ.सिन्हा श्रीधर रोबोट में आत्मनिर्णय की क्षमता और आत्मनिर्भरता निर्माण करना चाहते है| वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता को स्थापित करना चाहते है| वे उसके अंदर मानवीय भावनाएं निर्माण करना चाहते है और वे अपने इस कार्य में सफल भी होते है| डॉ.सिन्हा के पड़ोसी की युवा पुत्री मंजूषा कार दुर्घटना में अपने दोनों पैर खो चुकी है और वह स्वचालित कुर्सी का ही इस्तमाल करती रहती है| उसके देखभाल का स्थायी रूप से इतंजाम हो इसलिए डॉ. सिन्हा उसके माँ-पिताजी से श्रीधर रोबोट द्वारा मंजूषा की देखभाल करने का विचार रखते है| वे भी इसको स्वीकार करते है| बाद में श्रीधर मंजूषा की देखभाल करता है| उसका मंजूषा के प्रति लगाव भी डॉ. सिन्हा को नजर आता है जब श्रीधर मंजूषा को फूल भेंट देता है| एक दिन जब मंजूषा के घर में आग लग जाती है तो श्रीधर मंजूषा की जान बचाता है और वही जलता टुकड़ा उसपर गिर जाता है और बड़ा विस्फोट होकर वह खत्म हो जाता है| कहानी एक रोबोट के अंदर भावनाएँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्थापित होने की सम्पूर्ण सम्भावनाओं को व्यक्त करती है|
विनीता सिंघल की कहानी ‘अपराधी कौन’ विज्ञान प्रगति पत्रिका में अगस्त 1994 में छपी थी| कहानी प्रोफेसर एवं वैज्ञानिक प्रभाकर के मनोविज्ञान को दर्शाती है क्योंकि वे एक बड़े वैज्ञानिक होते हुए दुनिया उन्हें मित्रहन्ता समझती है| वे अपनी जीवन की स्थितियों को अपने मित्र दिवाकर को बताते है| प्रो.प्रभाकर ने एक बड़ा शोधकार्य करके ‘कालयान’ बनाया जिसको लोग केवल एक कल्पना समझकर मजाक उड़ाते थे|प्रो.प्रभाकर का दोस्त निरंजन भी एक वैज्ञानिक है और कई सालों से अनुसन्धान कर रहा है|निरंजन को एक ऐसे धातु की खोज है जो मजबूत है और जिसके अंदर आग सहने की क्षमता भी है| निरंजन को विश्वास है कि जब ऐसी धातु भविष्य में धरती पर मौजूद है तो आज भी कहीं न कहीं अवश्य होगी| निरंजन को प्रभाकर के कालयान का पता चलता है तो वे उनसे मिलकर कालयान में बैठकर उस धातु की खोज के लिए निकल पड़ता है| सभी वैज्ञानिक निरंजन एवं कालयान वापसी का इंतजार करते है| प्रभाकर ने कालयान बनाने में काफी मेहनत की थी फिर भी वे चिंता में थे| कालयान जब धरती पर आ जाता है तो पता चलता है कि निरंजन को धातु मिलती है लेकिन उनकी मृत्यु हो जाती है| प्रभाकर का गुणगान करनेवाले सब उनको हत्यारा बोलने लगते है| प्रभाकर दिवाकर को सब बताता है तो दिवाकर उस धातु और कालयान का अध्ययन करके निरंजन की मृत्यु का शी कारण ढूंढता है| वह साबित करता है कि निरंजन की मृत्यु रेडियोधर्मिता के कारण हुई है| रेडियोधर्मिता जिसकी समस्या वर्तमान में बढ़ रही है जिसकी तरफ संकेत लेखिका करना चाहती है| रेडियोधर्मि किरणे मनुष्य के लिए घातक सिद्ध हो रहे है| अल्फा,बीटा और गामा कण जो आणविक विद्युतीकरण के द्वारा बनते है वे रेडियोधर्मिता के स्रोत है| रेडियोधर्मिता की खोज हेनरी बैक्केरेल,मैडम क्यूरी और पिपरे क्यूरी ने संयुक्त रूप से की थी जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला था|
अर्चना शर्मा की कहानी ‘सूरज की मौत के बाद’ मई 1986 में विज्ञान प्रगति पत्रिका में छपी थी| लेखिका ने इस कहानी में दूसरी दुनिया की कल्पना की है| एक ऐसे ग्रह की कल्पना जहाँ मानव जीवन सृष्टि है साथी ही वहाँ के वैज्ञानिक विकास का भी चित्रण किया है| कहानी आत्मकथात्मक शैली में लिखी है| मै अर्थात कथा नायिका,अपर्णा और अनुराग तीनों का दल आकांक्षा नामक अन्तरिक्ष यान से एक रहस्यमय पिंड या ग्रह पर उतरता है| उस ग्रह का नाम है दरकागू जिसका अर्थ है- अँधरे का ग्रह| उस ग्रह पर ऑक्सीजन,सूरज की रोशनी,पेड़ कुछ भी नहीं है| तीनों के मन में एक जिज्ञासा निर्माण हो जाती है कि वहाँ ऊर्जा के स्रोत क्या है| वहाँ उनको एक दारक्या नामक प्राणी मिलता है| तीनों लोग पृथ्वी पर उपलब्ध सभी प्रकार के ऊर्जा स्रोतों की जानकारी दारक्या को देते है| वे उसे पेट्रोल.पाणी,कोयला,सूर्य,पेड़ सभी का ज्ञान देते है जिससे पाठकों के ज्ञान को भी बढ़ावा मिलता है| दारक्या तीनों को उनके ग्रह का ऊर्जास्रोत बताता है| तीनों को जानकारी मिलती है कि उस ग्रह में छिपकलीनुमा जीव है उनके अंदर लाल,नीले,पीले तार घुसें हुए है उसको वे लोग ‘टारगूरा’ कहते है| तीनों लोग दो साल वहाँ रहकर दरक्या को ‘बायोटेक्नोलॉजी’ का ज्ञान देते है| कहानी मनोरंजन तो करती ही है साथ ही ज्ञान भी बढ़ाती है|
डॉ.शशि सिंह की कहानी ‘भविष्य का भूत’ जिज्ञासा पत्रिका में सन 2000 में छपी थी| कहानी बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हुए परिवर्तनों और बहुक्षेत्रीय विकास पर प्रकाश डालती है| चिकित्सा,शिक्षा,जीवन शैली,संस्कृति सभी में परिवर्तन हुआ हैं| चिकित्सा के क्षेत्र में तो मनुष्य ने अभूतपूर्व क्रांति की है| जैवप्रौद्योगिकी का विकास हुआ है| कहानी इसी के सुफलों पर प्रकाश डालती है| कहानी के दो पात्र वाणी और संयुक्ता के बीच हो रहे वार्तालाप से इसकी समग्र जानकारी मिलती है| लेखिका कहानी के माध्यम से यह स्पष्ट करती है कि बीसवीं सदी के मध्यकाल में वैज्ञानिकों द्वारा डी.एन.ए.की संरचना की खोज हुई उसके बाद आनुवांशिकी के क्षेत्र में प्रगति हुई| मानव और अन्य कई प्राणियों के हर गुण के लिए जीन या जीन समूह की पहचान की गई और इक्कीसवीं सदी में जीनोम की पूरी जानकारी मानव के पास है| चिकित्सा क्षेत्र में प्रगति के कारण मृत्युदर कम हुई| लोग 60 के बाद भी सक्रिय रहते है| मानव ने काफी हद तक संक्रामक रोगों पर काबू पा लिया है| कहानी के उत्तरार्ध में लेखिका ने जनसंख्या एवं पर्यावरणीय प्रदुषण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दें सामने रखे है जिसको नियंत्रित करने के लिए शिक्षा के महत्व को स्थापित किया है|
विज्ञान कथा लेखन साहित्यिक समीक्षा के क्षेत्र में उपेक्षित है| विज्ञान कथा साहित्य का मूल्याकंन करके साहित्य जगत में उसको उचित स्थान देकर तथा पाठ्यक्रम में इसका समावेश करके विज्ञान कथा साहित्य को समृद्ध किया जा सकता है|



